अपनी बात

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Sunday, November 1, 2015

मंत्री जी का बछड़ा

वे ठेठ आम हिन्दुस्तानी हैं|
 
ज़िक्र हमारे बेहद करीबी दोस्त यारबाश खां का है| खां साहब उस ज़माने की बेख़ौफ़ लापरवाही का नायाब नमूना हैं, जब बच्चों को योजना बनाकर पैदा नहीं किया जाता था| वे तो ऊपर वाले के करम से खुद-ब-खुद अवतरित हो जाया करते थे| वे हैं भी ऐसे ही| सफ़र पर निकलते हैं, तो यह परवाह नहीं करते कि उनके पास टिकट है या नहीं| टिकट खरीदने के पैसे भी हैं या नहीं| जहाँ जाने के सोच रहे हैं वहाँ जाने की ज़रुरत भी है या नहीं| मां-बाप, यार-दोस्त और हितैषियों की हज़ार कोशिशों के बाद भी वक्त की पाबंदी उनके स्वभाव और किरदार का हिस्सा नहीं बन पायी है| पतंगबाजी, बारिश का सट्टा और क्रिकेट मैच की समीक्षा उनके ख़ास शगल हैं| खाली समय बिताने के लिए वे अक्सर गली के नुक्कड़ पर परचूनिए तेलूराम की दूकान पर स्थापित हो जाया करते हैं| वहाँ बैठते ही वे तुलसी बाबा के ख़ास चेले हो जाते हैं| ढोल, गँवार शूद्र और पशु तो उनकी सोच के दायरे में नहीं आते, बहरहाल नारियों को ताड़कर ही वे महात्मा कवि के वचनों को अपने जीवन में उतारा करते हैं| उँगलियों में सुलगती हुई बिना फ़िल्टर की पनामा छाप सिगरेट और कत्थे से रंगे दांत उनकी ख़ास पहचान हैं| चौड़ी मोहरी वाली खाकी पतलून, ढीली ढाली कत्थई बुश्शर्ट, चमड़े की चप्पल, चेहरे पर खुरदरी दाढ़ी, खिचड़ी मूँछें और सर पर बेतरतीबी से बिखरे बाल उनके व्यक्तित्व को रूप देते हैं|
 
एक दिन सब्जी मंडी के सामने नेगी पान वाले की दुकान पर मिल गए, कुछ खोये-खोये से, कुछ अनमने से| तेवर बदले-बदले से लग रहे थे| हाल-चाल पूछने पर पहले तो जेब से रूमाल निकाल कर माथे का पसीना पोंछा, फिर उसे करीने से तह करके जेब में रखा और बोले, “यार, बहुत हो गया| बेखुदी के आलम में बहुत अर्सा निकाल दिया है| ज़िंदगी का पहिया तेज़ी से घूम रहा है| अब तो कुछ न कुछ बदलाव होना ही चाहिए|”
 
हम जानते थे कि इस तरह के दौरे उन्हें पाँच, साढ़े पाँच साल में एक-आध दफा पड़ ही जाया करते हैं| इसलिए उनकी कैफियत पर ज्यादा तवज्जो नहीं दी| बस, हाल-चाल पूछ उत्तर का इंतज़ार करने लगे|
 
वे कुछ बोले ही नहीं| चुप हो गए और आसमान की तरफ ताकने लगे... शायद कोई विचारों का यू एफ़ ओ दिखाई देने लगा था|
 
कुछ क्षण बाद नेगी से पान लगाने को कहा और फिर आँखें मींचते हुए बोले, “ऊपर वाला भला करे!”
 
उनकी चुप्पी और ऊपर वाले की याद मामले को पेंचीदा बना गयी| इधर हम अवाक्, कटहल के पेड़ पर लीचियों का गुच्छा कैसे लटक रहा है| खां साहब, जिन्होंने भूल से भी कभी किसी बात को गंभीरता से नहीं लिया था, आज आँखों में बेचैनी का सागर लिए घूम रहे थे|
 
मन में आया कि ऊपर वाले को तो सभी याद करते हैं, इसमें नया क्या है| वैसे भी हम जिस व्यवस्था में जी रहे हैं, उसमें नीचे वाले भी हैं और ऊपरवाले भी| ऊपर वाले वोट माँगते हैं और नीचे वाले खैर| कुछ बीच वाले भी हैं, जो माँगते कुछ नहीं बस जो चाहते हैं, छीन लेते हैं| फिर भी, मामले की तह तक जाने की गरज से पूछ-ताछ करने की कोशिश की तो उन्होंने उलटा प्रश्न दागा, “आज का लोकल अखबार देखा है या नहीं?”
 
मैंने इनकार करते हुए टका सा जवाब दिया, “हम तो टाइम्स ऑफ़ इंडिया पढ़ते हैं|”
 
खां साहब तिरस्कारपूर्वक बोले, ”बस यही तो बात है| तुम पतलून टाई पहनने वाले लोग चाँद-सितारों की फ़िक्र तो करते हो, लेकिन ज़मीन की धूल की अहमियत भूल जाते हो|”
 
अपनी टाई की गाँठ को ज़रा ढीला करते हुए और उनसे मनुहार करते हुए कहा, “भई, बात क्या है, ज़रा खुलासा करके कहो|”
 
खां साहब ने जो मुझे विस्तारपूर्वक बताया उसका सार कुछ इस प्रकार था –
 
‘आज जब वे सुबह उठे तो उनकी नज़र अखबार में छपी एक खबर पर पड़ी| किस्सा कुछ यों था – मंत्री जी का बछड़ा, जो उन जैसे प्रभावशाली व्यक्ति के रुआब का प्रतीक होता है, गुम हो गया है|’
 
इसी बीच पान उनके सामने पेश किया गया| गिलौरी को गाल के भीतर सहेजते हुए बात को आगे बढ़ाया, “अब हालात ये हैं कि शहर की चीता पुलिस का एक पूरा दस्ता उसकी तलाश में लगा हुआ हैं| बछड़े के फोटो सभी थानों और चौकियों के नोटिस-बोर्डों पर चस्पा कर दिए गए हैं| दुआएँ दीं और माँगी जा रहीं हैं|”
 
मैंने अपना ज्ञान बघारते हुए कहा, “खां साहब, कोई समय जा रहा है जब चारों तरफ हो-हल्ला होने लगेगा| पशुप्रेमी बछड़े की सुरक्षा को लेकर शोर मचाएंगे| धार्मिक-जन बछड़े की जाति को लेकर इसे धार्मिक मामला साबित करने की चेष्टा करेंगे| मानवतावादी मंत्री जी के दुःख को लेकर लेकर टसुवे बहाएंगे| महिलावादी मंत्री जी की पत्नी के मानसिक क्लेश के आधार पर इसे महिला सशक्तिकरण का मंच बनाने के उद्योग में जुट जाएंगे| व्यवस्थावादी पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर और विपक्षी दल मंत्री महोदय की लापरवाही को लेकर तूफ़ान खड़ा करने लगेंगे|”
 
यारबाश मियाँ ने बात की तसदीक करते हुए इत्तिला दी कि यह तो पहले ही शुरू हो चुका है| उन्होंने आगे कहा, “यहाँ तक की पार्टी के उनके अपने चमचे इस घटना को मंत्री जी की हैसियत पर चोट करार दे रहे हैं| अगड़े इसे ऊँची जातियों के प्रति सरकारी उपेक्षा का नमूना साबित करने पर तुले हैं और पिछड़े सदियों से सताए जा रहे गरीब बेसहारा मजदूर वर्ग को समाज से खारिज करने की योजना का अंग मान रहे हैं| गो-भक्त इसे गो-भक्षकों की कारस्तानी मान रहे हैं, तो गो-भक्षक स्वयं को बदनाम करने के लिए रची गयी गो-रक्षकों की साजिश|”
 
मेरे मन में ख्याल आया, “सूरते-हाल तो आन्दोलन के बन रहे हैं| अब जल्दी ही चन्दा जमा होने लगेगा| छपाई के टेंडर जारी होने लगेंगे| शाम ढलते-ढलते शहर भर की दीवारें पोस्टरों से पट जायेंगी| व्यापारियों का काला धन झंडे, भीड़ और स्लोगन की शक्ल में गलियों को गुलज़ार कर देगा|”
 
दिल की बात को भाँप कर मियाँ कहने लगे, “प्रशासन की गहमागहमी उरूज पर है| अलग अलग महकमों में अतिरिक्त नौकरशाह मांगे जाने लगे हैं| नई नियुक्तियों के लिए कार्रवाई प्रारम्भ हो चुकी है| अफरातफरी का माहौल है|”
 
उन्हें तसल्ली देते हुए समझाने की कोशिश की और कहा, “अरे छोड़ो, मियाँ! सारे एक आवे के ही बर्तन हैं| और वैसे भी यह सब तो होता ही रहता है| प्रजातंत्र का अर्थ ही हंगामा होता है| हंगामा नहीं होगा तो जन-प्रतिनिधि किस आधार पर चुने जायेंगे? हंगामा नहीं होगा तो न्यायालय बंद नहीं हो जायेंगे? हंगामा नहीं होगा तो सारा प्राशासनिक अमला और पूरी कार्यपालिका की व्यवस्था बेकार न हो जायेगी? हंगामा नहीं होगा तो मीडिया के पास काम ही क्या रह जाएगा? प्रजातंत्र के चारों पहरुए हाथ पर हाथ रख कर नहीं बैठे रह जायेंगे? प्रजातंत्र को लाने के लिए दी हुई बड़े-बड़े नेताओं की कुर्बानियाँ निरर्थक नहीं हो जायेंगी?”
 
इसी बीच नेगी ने रेडियो चालू कर दिया| उस पर समाचार आ रहे थे| बछड़ा खोने वाली घटना प्रमुखता से छाई हुई थी| खबर मिली कि इसी सन्दर्भ में एक घटना और घट गयी है, मुक्तलिफ़ संगठनों ने बछड़े को खोज कर लाने वाले के लिए इनाम का ऐलान करना शुरू कर दिया है| इनाम की रकम हर अगले ऐलान के साथ बढ़ती जा रही है|
 
खां साहब ने नाली में पीक मारी और ठुड्ढी को हथेली के पिछले हिस्से से साफ़ करते हुए बात आगे बढ़ाई, “कह तो ठीक रहे हो| वैकल्पिक राजनीति और समानांतर राज्य व्यवस्था के शैदाईयों के लिए भी तो कुछ न कुछ मुद्दा बना रहना चाहिए|”
 
अपने जीवन के सारे अनुभव का निचोड़ खां साहब के हुज़ूर में पेश करते हुए सिफारिश की, “देखो भाई, तुम इतने उदास मत रहो| कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है| तुम ठेठ आम हिन्दुस्तानी हो, तुम्हें जागने की ज़रुरत नहीं है| तुम तेलूराम की दूकान के फड़ पर बैठ कर शहर की खूबसूरती को सार्थक बनाओ| इसी में तुम्हारी भी सार्थकता है|”
 
खां साहब को दुनियादारी समझाते हुए सलाह दी, “बछड़े को छोड़ो, उसके गायब होने की खबर पर ध्यान दो जिसने शहर के कोने कोने में भौचाल पैदा कर दिया है|”
 
उदास नज़रों से एक ओर ताकते हुए उन्होंने कहा, “तो तुम्हें लगता है कि अब बछड़े के मिल जाने से अच्छा उसका न मिलना ही है?
 
मैं चुप रहा, लेकिन उन्हें अपने सवाल का जवाब मिल चुका था| मुझे पता नहीं कि यारबाश खां मेरी बात से कितने सहमत हुए, लेकिन मुझे लगा कि क्षणभर के लिए उनके चेहरे की चमक गायब हो गयी, आँखों के सामने धुंधलापन छा गया| इसके बाद अपनी चिरपरिचित लापरवाही के साथ होठों की कोर से मुस्कराकर जेब में रखी सिगरेट निकाली और पास से गुजरते हुए सब्जी के ठेले वाले से “अरे भाई, माचिस है क्या?” कहते हुए वह ठेठ आम हिन्दुस्तानी एक ओर चल पड़ा|

चित्र - http://hi.gofreedownload.net से साभार
 

2 comments:

  1. "ढोल, गँवार शूद्र और पशु तो उनकी सोच के दायरे में नहीं आते, बहरहाल नारियों को ताड़कर ही वे महात्मा कवि के वचनों को अपने जीवन में उतारा करते हैं|"

    ताड़ना काप्रयोग अति उत्तम है सर I

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  2. इस प्रयोग से आपने तुलसीदासजी को नारी जाति का कोपभाजन बनने से भी बचा लिया। बहुत सुन्दर लेख !

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