अपनी बात

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Wednesday, October 21, 2015

किताबों से कभी गुजरो

पिछले दिनों ‘नगर पालिका पुस्तकालय’ जाना हुआ| जाते हुए मन प्रसन्न था कि किताबों की दुनिया में कुछ समय बिताने को मिलेगा लेकिन वहाँ पहुँचकर इस इच्छा पर बिजली गिर पड़ी| पता चला कि पुस्तकालय को किराए पर उठाने के लिए सभागृह में परिवर्तित कर दिया गया है| मन दुखी हो उठा| बचपन में जहाँ बैठकर घंटों अध्ययन किया था, चंद पैसों के लिए उस ज्ञान के मंदिर को मटियामेट कर दिया गया|
 
सच कहूँ, हाल सभी जगह यही है| पुस्तकालयों के लिए आरक्षित स्थानों का व्यावसायिक प्रयोग हो रहा है| | पुस्तकालय चलाने के लिए निधि उपलब्ध नहीं हैं अत: वे बंद होकर बारातघर और मॉल में परिवर्तित रहे हैं| बाजारवादी और पूंजीवादी दुनिया में पुस्तकों के महत्त्व को सिरे से नकारा जा रहा है| बौद्धिकता और ज्ञान प्राप्ति की इच्छा का स्थान धनार्जन की ललक ने ले लिया है|
 
किताबें कभी हमसे हमारा परिचय कराती हैं, तो कभी नितांत अपरिचित व्यक्तियों से अनायास पहचान करा देती हैं| बीते समय को अचानक हथेली पर लाकर टिका देती हैं| भविष्य को देखने के लिए तैयार करती हैं तो वर्तमान को समझने की योग्यता उत्पन्न करती हैं| क्या खूब लिखा है गुलज़ार साहब ने –
किताबों से कभी गुजरो तो यूं किरदार मिलते हैं,
गये वक्तों की ड्योढ़ी में खड़े कुछ यार मिलते हैं
 
सच और झूठ के बीच का अंतर होती हैं किताबें| हमारे समय में अजीबो गरीब घटनाएँ घटती हैं, हमसे पहले और भी विचित्र घटनाएँ घट चुकी हैं और हमारे बाद भी घटनाओं का कारवाँ ऐसे ही चलता रहेगा| घटनाओं में सच और झूठ की चास लगती रहती है| उन घटनाओं में झूठ की छाजन को किताबें सूप की तरह दूर करती रहती हैं|
 
किताबें दिमाग की उलझन को सामने ला कर खड़ा कर देती हैं, सुलझाती हैं और दृष्टिकोण को विस्तार देती हैं| जो दिख रहा है, उसके पीछे कितना छिपा है यदि यह देखना है तो किताबों का दामन थामिए| देखिएगा, कितने रंग खिलते हैं| दुःख-दर्द, हास-परिहास, क्रोध-घृणा का सच सामने रख देती हैं|
यूं ही बेसबब ना फिरा करो, कोई शाम घर भी रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके चुपके पढ़ा करो
 
पुस्तकों की उपेक्षा की कहानी नई भी नहीं है| कहते हैं, बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में आग लगवा दी थी और वह लगातार छह महीने तक जलता रहा था| आक्रमणकारी अन्य देशों पर अधिकार करने के लिए वहाँ के ज्ञान और उस ज्ञान के रक्षक पुस्तकालयों को समाप्त करते थे|
 
किताब को संभालकर रखिये| उसमें लिखे को पढ़िए, न केवल पढ़िए बल्कि गुनिये भी| और ध्यान रहे, यह भी आपकी ही जिम्मेदारी है कि जो उसमें लिखा है उसके सच्चे मानी ही आपके ज़हन के दरवाजों के भीतर जाएँ नहीं तो गीता, बाइबिल और कुरआन भी तलवार बन जाती हैं और जब चलती हैं तब यह नहीं देखतीं कि गर्दन किसकी है| किताब को गलत हाथों में मत जाते दीजिए| अगर ऐसा हुआ तो पन्ने तो आपके रहते हैं लेकिन, उन पर लिखे शब्दों के अर्थ दूसरों के हाथ की कठपुतली बन जाते हैं|
पुस्तकं वनिता वित्तं परहस्तगतं गतम्|
यदि चेत्पुनरायाति नष्टं भ्रष्टं च खण्डितम्||
 
मैं अपनी बात कहूँ तो पुस्तकें मेरा सर्वस्व हैं| किताबें पढ़ने का आनंद गूंगे के लिए गुड़ के स्वाद जैसा है| पुस्तकें दुनिया की सैर कराती है| इन्हें पढ़ने से अपूर्व संतुष्टि मिलती है| किताबें हमारी बौद्धिकता और मानसिकता का पोषण करती हैं| पुस्तक जीवन का अभिन्न अंग है| पुस्तक गुरू के समान होती है। मेरा विश्वास है कि हर मनुष्य को पुस्तक से जुड़ना चाहिए|
 

2 comments:

  1. आपका पोस्ट पढ़ कर कई बातें एक साथ याद आती चली गई. सफ्दर हाशमी की नज़्म " किताबें बातें करती हैं" जो किताबों मे शामिल अनंत विषयों की बात करती है और साक्षरता अभियान के लिए लिखी गई थी. और फिर गुलज़ार साहब की "किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों से जो ebooks के ज़माने मे पन्ने पलटने के गुम होते लुत्फ़ की बात करती है. आपने भी ज़रूर पढ़ीं होंगी.
    मेरे लिए किताबें अपने को, लोगों को और दुनिया को समझने का सरलतम ज़रिया है. ये अलग बात है कि जिस बात को लोग नहीं मानना चाहते उन्हे " किताबी बातें" कह कर खारिज कर देते हैं पर मेरे लिए ज़िंदगी की किताब किताबों की ज़िंदगी से जुड़ी हुई है. और हन, पत्नी के शब्दों मे कहूँ तो किताबें उनकी सौतने हैं जिनसे लड़ा भी नहीं जा सकता!!

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    1. जी, बढ़िया बात कही हैं आपने| मै भी किताबों को समय के बैंक की तरह मानता हूँ जहाँ समय को विचारों, भावनाओं और अनुभवों के रूप में परिरक्षित या प्रिज़र्व किया जाता है|

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