अपनी बात

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Monday, October 26, 2015

‘सूट’ और ‘हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी’

सुबह-सुबह हजामत बनाकर निपटे ही थे, श्रीमती जी ने शुभ-सूचना दे डाली कि कोई कपड़ा धुला हुआ नहीं है| निगोड़ा धोबी एक सप्ताह पहले कपड़े ले गया था और आजतक लौटाकर नहीं गया| मुदर्रिस आदमी हूँ, रातभर के मुसे हुए कपड़े पहनकर काम पर जा नहीं सकता| ‘क्या करूँ’ इस यक्ष प्रश्न का उत्तर मन के युधिष्ठिर ने तुरंत दिया – “पहले तो धोबी की ताजपोशी करो|”
 
गरीब धोबी को जीभर कोसने के बाद विचार करना शुरू किया कि अब क्या पहना जाए| इधर हमारा मनन चल रहा था, उधर देवीजी शोएब अख्तर बनीं लानतों के एक से एक घातक बाउंसर मार रहीं थीं|
 
पहले लगा कि वे अपने सामने धोबी की काल्पनिक मूर्ति रचकर उससे मुखातिब हैं, पर ध्यानपूर्वक सुना तो समझ आया – ‘अरे, यह तो हमारा ही सम्मान समारोह चल रहा है|’
 
यह ख़याल करना हमारी अक्ल के घेरे से बाहर था कि अगर धोबी नहीं आया तो इसमें हमारा क्या कुसूर है| उनके तानों-उलाहनों की आग उगलती गोलीबारी के बीच हमें पति के रूप में अपना कैरियर ख़त्म होता जान पड़ने लगा| बात धोबी के न आने से शुरू हुई, फिर हमारी पान खाने की लत पर पहुँची, महंगी और खराब सब्जी खरीद लाने के किस्से का ज़िक्र हुआ, और तो और बच्चों को पढ़ाने से जी चुराने के आदत का भी उल्लेख किया गया| दोस्तों के साथ टेलीफोन पर बतियाने के हमारे शौक को समयनाशक कार्यों में शुमार किया गया| कुँवारेपन के ज़माने में लिखी हुई प्रेमपगी कविताओं के आधार पर हमारी चारित्रिक दुर्बलता का हवाला दिया गया| हमारी माँ के स्वयं के प्रति तीखेपन को परिवार के सभी सदस्यों की मिली-भगत के रूप में प्रकाशित किया गया| ऐसे ऐसे और भी मसलों को अपने ओजस्वी भाषण में लपेटते हुए देवीजी अंत में हमारे उस साहसिक कारनामे पर पहुँची जब हब हमने अपनी सासजी के अपने घर में चल रहे दीर्घावधि प्रवास को लक्ष्य कर अनजाने में कुछ ठिठोली कर दी थी| सासजी जी की पराजित भाव-भंगिमा ध्यान आते ही मन में हुलास की हिलोर दौड़ गयी, पर समय की नजाकत देखते हुए उसकी अभिव्यक्ति को किसी और समय के लिए टाल गए| साक्षात् प्रलय को निमंत्रण देना हमें समीचीन प्रतीत नहीं हुआ| हम पूरे कार्यक्रम के दौरान बुत बने श्रृंगार को वीर और वीर को रौद्र रस में बदलने की प्रक्रिया देखते रहे| हमें लगा कि कोई अदृश्य रिमोट ‘मानव टी वी’ के चैनल बदल रहा है| सबसे अंत में आया आँसुओं का सैलाब, जिसमें हमारी निर्लज्ज कल्पना ने एक-एक कर हमारी आत्मा के पट घोने शुरू कर दिए| अंत में हमेशा की तरह हमने सर झुकाकर अपराधों को स्वीकार किया| आठ सौ सैंतालीसवीं बार अपने गुनाहों से तौबा करने की कसम खाई| तब जाकर देवी जी के स्वर में कुछ बदलाव के चिह्न प्रकट हुए| मामला लौट-फिर कर उसी मुद्दे पर आ गया कि क्या पहना जाए| बहुत सोच विचार के बाद सुझाव मिला कि शादी के समय सिलवाया हुआ सूट पहन लिया जाए|
 
उस सूट में एक मात्र अच्छाई यह थी कि वह साबुत था और बुराई... पहली तो उसका इतिहास – उस ऐतिहासिक सूट का कपड़ा हमारे ससुर साहब को उनके दफ्तर से उपहार स्वरूप मिला था| आप पूछते हैं कि इसमें क्या खराबी हैं? एक मिनट साहेबान, ज़रा बात तो पूरी होने दीजिए|
 
हमारे ससुर साहब एक बड़ी कंपनी में अफसर हैं| आदमी तो योग्य हैं, पर काहिली में हमारे भी चचा हैं| ऐन दीवाली के मौके पर उनकी कंपनी ने अपने सभी मुलाज़िमों को गरम सूट का एक एक कपड़ा देना तय किया| चूँकि, सब जानते हैं कि वे काहिली में हमारे भी चचा हैं, इसलिए स्वाभाविक है कि जब वे स्टोर पहुंचे तब तक अधिकारियों को दिए जाने वाले सभी कपड़े बाँटे जा चुके थे| किसी तिकड़मी ने पहले ही उनके हिस्से का कपड़ा हथिया लिया था| बात को आगे बढ़ने से रोकने की खातिर कंपनी के शातिर स्टोर कीपर ने उन्हें चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को दिए जाने वाले दो कपड़े लेने पर राजी कर लिया| उनमें से एक का उन्होंने स्वयं के लिए बंद गले का सूट बनवा लिया और दूसरा, पूरे पाँच साल तीन महीने सात दिन के बाद सगाई के मौके पर हमें भेंट कर दिया| अपनी होने वाली पत्नी के इसरार पर हमने उस बेढंगे, आउट डेटेड, बोरीनुमा कपड़े को न केवल सिलवाया बल्कि उसे पहन कर घोड़ी पर भी चढ़ लिए| भगवान जाने उस बेजुबान जानवर ने उस कपड़े की रगड़ को क्या सोच कर बर्दाश्त किया होगा|
 
दूसरी परेशानी है – पिछले तेरह वर्षों में महंगाई सा बढ़ता हमारी कमर का घेरा| जो कभी अट्ठाईस था, अब छत्तीस हो गया है| घुटने मोड़ कर भी पाँव के पंजे छूना अब स्वप्न सरीखा हो गया है| हमें डर था कि कहीं हमारे शरीर का आकार देख कर सूट विद्रोह न कर दे| यूँ भी, जैसे ताल्लुकात उसके साथ हमारे रहे हैं, हमें लगता नहीं था कि हमारी शर्म को ढकने के लिए वह अपनी ओर से कोई कोशिश करेगा|
 
तीसरी समस्या यह थी कि हमने पिछले तेरह वर्षों से सूट न पहना था, तो ज़ाहिर है, टाई की गाँठ भी न बाँधी थी| टाई की गाँठ तो वैसे उससे पहले भी कहाँ बाँधी थी| बाँधनी आती भी किसे है| जब ज़रुरत पड़ी, किसी यार दोस्त से बँधवा लाये| मन में सैकड़ों शंकाएँ थीं – पता नहीं सूट हम पर फबेगा भी या नहीं, टाई की गाँठ किससे बंधवाई जाए, सूट पहन कर साइकिल पर चलते हुए चुगद तो न दिखाई देंगें!
 
खैर साहब, बिफरी हुई बीवी को संभालने के लिए उसका कहा तुरंत मानना चाहिए| हमने भी माना| अपनी राय देकर हम अपनी जमी जमाई गृहस्थी में सुनामी नहीं लाना चाहते थे| गरज यह, परीक्षा कठिन थी पर हमने दो और दो चार जोड़कर अपने स्वत्त्व का बलिदान करना ही उचित समझा| देवी जी को विनम्रता के साथ इस सम्बन्ध में अवगत करा दिया साथ ही उनसे सूट पर इस्तरी कर देने का मीठा सा अनुरोध भी कर दिया|
 
सूट तैयार हुआ| श्रीमती जी के सहयोग से उसे बदन पर चढ़ाया| पतलून के बटन तो खैर इज्जत की खातिर किसी तरह से बंद कर लिए, लेकिन कोट के बटन बंद करने की गुंजायश बिल्कुल भी न थी| सो, उन्हें खुला ही रखने का निर्णय किया गया| पप्पू भागकर बराबर में रहने वाले एक परिचित मेडिकल रिप्रेसेंटेटिव से टाई की गाँठ बँधवा लाया| जूते के तस्मे बाँधने के लिए झुकना नामुमकिन देखकर इस समस्या का समाधान देवीजी ने अपने ऊपर ले लिया| तंग पतलून पहन कर साइकिल पर चढ़ाना भी असंभव जान पड़ा| निदान, पहले हमें एक स्टूल पर चढ़ाया गया, उसके बाद हम गिलाफ चढ़े गाव-तकिये से साइकिल पर विराजमान होकर स्कूल के लिए निकल पड़े|
 
पता नहीं क्यों, उस दिन हमारे मन में पीछे के दरवाज़े से स्कूल में घुसने का ख्याल आया| हमने किया भी ऐसा ही| छिपते-छिपाते, सबसे नज़रें बचाते स्टाफ रूम तक जा पहुँचे| अन्दर घुसे ही थे, सामने से बीड़ी फूँकते मास्टर गुलजारी लाल आते दिखाई दिए|
 
मास्टर गुलजारी लाल बहुत ही मिठबोले पर बेहद घातक जंतु हैं| उनकी फितरत ऐसी है कि जड़ काटते जाएँ और पानी देते जाएँ| वे स्वयं को हमारा मित्र दिखाते हैं| हम उन्हें अपने शत्रुओं में शामिल करना भी अपनी शान के खिलाफ समझते हैं| इसके भी दो कारण हैं – पहला तो यह, वे भी उसी कसबे से ताल्लुक रखते हैं जहाँ हमारी ससुराल है| दूसरा यह, उनके माथे पर पड़े हुए झबरीले कुत्तेनुमा बालों को देखकर हमेशा ही हमारा रक्तचाप बढ़ता रहा है|
 
उन्होंने अर्थपूर्ण दृष्टि से हमें सिर से पैर तक देखा फिर बोले, “क्या बात है बन्धु, बड़े खिल रहे हो| कुछ ख़ास बात? साली–वाली आई हुई है क्या? या, शादी की सालगिरह है?”
 
दिमाग भन्ना गया, फिर सोचा सुबह-सुबह क्यों मूड ख़राब किया जाए| बस तरह देकर रह गए| जब उन्होंने बार-बार अपना प्रश्न दोहराया तो हमने भी बात को ख़त्म करने की गरज से खुन्नस भरे स्वर में धीरे से कह दिया, ”हाँ, शादी की सालगिरह है, आ जाना, तुम्हारी भी दावत है|” शरारत भरी मुस्कान फेंककर गुलजारी लाल अपने रास्ते निकल गए|
 
कुछ ही मिनट बीते थे कि पाठक जी आ पहुँचे| आते ही कहने लगे, ”बरखुरदार, गुलजारी बता रहा था कि आज तुम्हारी शादी की सालगिरह है| भई, बहुत-बहुत बधाई|” मन तो किया कि चीख कर कहें, ”यहाँ हम जैसे तैसे अपनी शादी बचाकर आ रहे हैं, और आप हैं कि शादी की सालगिरह का राग अलाप रहें हैं|” पाठक जी बुजुर्ग आदमी है, उन्हें इस तरह का जवाब देना शोभा नहीं देता| मूक रहना ही अच्छा समझा|
 
रजिस्टर पर दस्तखत करने पहुंचे तो मैडम बागबहार के दर्शन हो गए| वे हाथ में चाय का प्याला लिए, समोसों पर हाथ साफ़ कर रहीं थीं| उन्होंने भी हमें देखते ही शादी की सालगिरह की बधाई दे डाली| तेल न मिठाई, चूल्हे धरी कड़ाही| मन हुआ कि हाथ का कलम उनकी दवात जैसी नाक पर दे मारें और कहें कि शादी की सालगिरह है तो उनके बाप का क्या जाता है! पर, उस मानव-महिषी के डील-डौल की वजह से उनसे हम ज़रा दबते हैं| उन्हें भी शायद इस बात का इल्म है, इसीलिए वे हमें सताने का कोई मौक़ा अपने हाथ से नहीं जाने देतीं| बात आगे न बढ़े, इस उद्देश्य से हम निरुत्तर ही रहे|
 
बड़े बाबू भी वहीं विराजमान थे| उन्होंने उठकर तपाक से हाथ मिलाया और लगे हाथ शुभकामनाएँ भी दे डालीं|
 
बेड़ा गर्क हो उस गुलजारी का| यह क्या फैला दिया उस नामाकूल ने! हमने अपनी आदत के मुताबिक़ चुप रहने का निर्णय लिया और हाथ में माला लेकर एक-एक मनके पर उस दुष्ट गुलजारी को दस-दस गालियाँ देते हुए क्लास की ओर चल पड़े|
 
क्लासरूम में प्रवेश करते ही हमारी नज़र ब्लैक बोर्ड पर जा पड़ी| उस पर भी ‘हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी’ का नारा बुलंद था| यह तो हद्द हो गई| हमने पानी पी-पीकर क्लास के लड़कों को कोसना शुरू किया| सरकारी स्कूल के मास्टर के क्रोध की सीमा से लड़के भी परिचित होते हैं| वे चुपचाप हमारे वचनों को उसी भाव से सुनते रहे जिस भाव से अपनी बहुओं की बुराई में मशगूल बूढ़ी ताइयाँ और दादियाँ नामकीर्तन सुना करती हैं| किसी पर कोई असर नहीं हुआ| भला कुलिया में भी दूध कढ़ा करता है कहीं?
 
उस दिन तो यह हाल हो गया कि हम जिधर से निकल जाते थे, कोई न कोई शादी की सालगिरह की बधाई देता मिल जाता था| कोई हमारा मौन विरोध समझ नहीं पा रहा था, या समझना नहीं चाहता था| अजीब पागलपन का आलम था| हमार मन रोने को करने लगा| हमें लगने लगा था कि हमारे खिलाफ कोई षड्यंत्र रचा जा रहा था| जैसे-तैसे छुट्टी हुई और हम घर की तरफ भागे|
 
र में कदम रखा ही था कि हमारा दिल अजीब तरह सनसनाने लगा| किसी अनहोनी की संभावना मन में घर करने लगी| तभी रसोईघर के रास्ते से हमारी श्रीमती जी ने अंतिम दृश्य के मंचन के लिए रंगमंच पर प्रवेश किया| उनकी आँखें लाल थीं| नथुने फड़क रहे थे| आवाज़ में बनावटी नरमी लाते हुए बोलीं, ”गुलजारी भैया का फोन आया था| आपने आज स्कूल में मैरिज एनिवर्सरी की खुशी में दावत दे डाली ...हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी!!”
 
इसके बाद सीधे-सीधे लक्ष्य संधान करते कहना शुरू किया, ”उस निगोड़ी बागबहार को दावत देने के लिए इतना बड़ा प्रपंच रचते तुम्हें शर्म नहीं आई.....”
 
बेले की बला बंदर के सिर| हम सर झुकाए निस्तब्ध, नीरव खड़े थे| जानते थे कि अगर कुछ भी कहा तो हमारे खिलाफ ही जाएगा| तूफ़ान थमेगा तब अपना छप्पर समेटेंगे| फिलहाल तो गिरती दीवारों से कपाल बचाने का सवाल ज़्यादा बड़ा था| कभी तो हवाओं का रुख बदलेगा! कभी तो सनसनाते ओलों की बरसात बंद होगी| कभी तो सब चुप होंगे| कभी तो शोर थमेगा| और, उधर सातवें आसमान के किसी कोने में बैठा कोई यह सोच रहा था कि सरकारी स्कूल का यह मास्टर कभी तो कुछ बोलेगा और सबको शांत कर देगा|
 
ज़िंदगी ऐसे ही चलती चली जा रही है| देखते हैं कि कौन बड़ा आशावादी है| कौन मैदान में देर तक डटा रहता है| ऊपर वाले का तो पता नहीं पर अपने हम जानते हैं| दुष्यंत कुमार के शब्दों में कहें तो -
 
इस शहर में अब कोई बारात हो या वारदात,
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ|

3 comments:

  1. अरसे बाद एक ऐसी रचना पढ़ी जिसमे गृहस्थ जीवन की सहज स्थितियाँ शालीन हास्य की मधुर चाशनी मे लपेट कर प्रवाहपूर्ण भाषा मे प्रस्तुत की गई हों. एक ऐसे समय मे जब शब्दों का इस्तेमाल आग लगाने, उत्तेजना जगाने और दर्द की अतिरंजक अभिव्यक्तियों के लिए किया जा रहा है, आपकी रचना "निर्मल आनंद" (साभार: film खूबसूरत ) के लिए लिखी गई है और अपने उद्देश्य को पूरी करती है. आभार!

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    1. धन्यवाद! आपको रचना अच्छी लगी, मेरे लिए संतोष का विषय है| अपने अपनी प्रतिक्रिया दी, मेरे लिए अन्यतम आनंद का विषय है| अन्य रचनाओं पर भी आपकी सम्मति की प्रतीक्षा रहेगी|

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  2. अरसे बाद इतनी उच्चकोटि का व्यंग्य पढ़कर आनंद आ गया सर ! इसी प्रकार लिखते रहेंगे तो हमारा भी खून बढ़ता रहेगा !

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