अपनी बात

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Friday, October 16, 2015

हो जाय, एक चाय

एक पुराने पुराने परिचित हैं, बचपन के| सालों से उन्हें देखा न था, चुनांचे उनके बारे में भूल ही गया था| मिल गए थे कल, अचानक, सड़क पर घूमते हुए जैसे, तार में करंट आ जाए और उत्तर प्रदेश की शामें बिजली से जगमगाती दिखाई देने लगें| अचम्भा सा महसूस हुआ| हाल बदला हुआ था, मिजाज़ बदला हुआ था| थोड़े सनकी से तो हमेशा से ही रहे हैं, लेकिन उस दिन तो हद्द ही हो गयी| कहने लगे, “पेड़ की डाल पर मछलियाँ उगाऊँगा, जड़ों के नीचे अंगूर जमाऊँगा, पत्तों की मेज-कुर्सी बनाऊँगा और सभी मरे हुओं के साथ बैठकर दावत उड़ाऊंगा|”

दिमाग चकरा गया, पाँवों का संतुलन लड़खड़ा गया और सोच का दरवाजा भड़भड़ा गया| पूछा, “भैय्ये, चढ़ाए हो क्या, दिन में ही लगाए हो क्या?”

“हमारे खानदान में किसी ने खरीद कर नहीं पी| परम्परा तुड़वाओगे क्या, खानदानी शान पर बट्टा लगवाओगे क्या?”

हम परेशान थे, बेइन्तेहा हैरान थे| समझ नहीं पाए, इतने अजीब ख्यालात उनके दिमाग में कहाँ से आए| अपने विचारों की गुत्थियाँ सुलझाने की गरज से कहा, “खुल कर बताइये, ज़रा पूरा वाकया सुनाइये| ये फितूर सिर पर कहाँ से चढ़ा है, क्या शैतान ने तुम पर कोई मंतर पढ़ा है?”

माथा खुजलाया, हाथ को आगे पीछे झुलाया और बोले, “वो तो सब ठीक है, पर तुम इतने दिन कहाँ थे? सुना है तुम्हें तुम्हारी मौहल्ला समिति ने ‘कविकुल शिरोमणि’ की उपाधि प्रदान की है|”

सुनकर हमारी बाँछे खिल गयी और पूछा, “तुम्हें हमारी प्रसिद्धि की खबर कहाँ से मिल गयी?”

कहने लगे, “मेरे भोले बलम, इस कुर्ते में बड़ा बड़ा राज़ छिपा हुआ है| तुम्हारे इस सम्मान के बारे में दो-चार लोगों को ही तो पता है| कम से कम प्रेस विज्ञप्ति तो निकलवा ही दी होती| अगर सम्मान लेने से पहले पूछते तो बताता कि और भी प्रसिद्धि कैसे पा सकते थे! ऐसा नुस्खा देता कि चारों तरफ टीवी, अखबार, रेडियो, पत्र-पत्रिका, इंटरनेट सभी जगह तुम्हारे ही चर्चे होते|”

हमने नुस्खा बताने का इसरार किया तो यह कहते हुए बल्लू के चाय के खोखे में प्रविष्ट हो गए, “आओ, पहले जरा चाय-वाय का आयोजन हो जाए, उसके बाद बात चीत करते हैं|”

हमने चाय का ऑर्डर दिया तो बोले, “जरा समोसे भी मंगा लो| हमारा तो कुछ नहीं, मौसम की मांग है, भाई|”

चाय आती, उससे पहले चार छह मुफ्तखोर भी वहाँ आकर जम गए| जो भी आसपास दिखाई दे जाता, आवाज देकर चाय पीने के लिए बुला लेते| अच्छा खासा मजमा लग गया| मुफ्त की शराब काज़ी को भी हलाल| मरता क्या न करता, उनके लिए भी चाय समोसों का आदेश देना पडा|

हमने फिर से प्रसिद्धि पाने का नुस्खा पूछा तो कहने लगे, “बात समझो, शोहरत को जितना ठुकराओगे, उतना ही अपने पास पाओगे|”

“यानि?”

“यानि तुम्हें उपाधि लेने से मना कर देना चाहिए था, फिर देखते|”

हमने झेंपी सी हँसी हँस कर कहा, “मौहल्ला स्तर पर तो चाय-पानी, पंडाल, बर्तनों का किराया; सब का खर्चा अपनी ही जेब से देना होता है| जो आप कह रहे रहे हैं, वो राष्ट्रीय स्तर पर होता है|”

आसपास बैठे श्रोताओं से मुखातिब होकर बोले, “भाई लोगों, आप लोगों के ख्याल में राष्ट्रीय स्तर पर क्या होता है?”

समोसे को चटनी में डुबाते हुए एक श्रोता ने कहा, “लोग पुरस्कार, उपाधि लेने से मना कर देते हैं, मुफ्त की प्रसिद्धि मिलती है| टीवी पर फुटेज मिलती है| राजनीति में आने का मौक़ा रहता है| और भी बड़े पुरस्कार के लिए नामित होने का चांस बन जाता है| तसलीमा नसरीन को नोबल प्राइज ऐसे ही तो मिला है|”

हँस कर कहने लगे, “बात तो सही कह रहे हो, गुरु! पर, इस मामले को लेकर इतने भी भावुक न हो जाओ कि सामान्य ज्ञान बंगाल की खाड़ी में गोते खाने लगे|”

चाय की सतह पर जमी पपड़ी को फूंक मारकर हटाते हुए, बिना हमारी ओर देखे ही हमसे बोले, “देखो, आज के जमाने में सीधी चाल से सरपट भागना ऐसा है जैसे, ट्रेडमिल पर दौड़ना| आप भागते तो रहते हैं, पूरी जान लगा देते हैं लेकिन हिलते एक इंच भी नहीं| जब तक टकराव न हो, हुज्जत न हो, विवाद न हो तब तक यश और प्रतिष्ठा से आपका छत्तीस का आंकड़ा ही रहता है|”

हमने पूछा, “और अगर फिर भी काम न बना तो?”

तुरंत जवाब मिला, “दलाल का दिवाला क्या और मस्जिद में ताला क्या| न बने तो न बने, कोई और रास्ता देखेंगे|”

बातचीत के रसिक किसी श्रोता ने फिकरा कसा, “लेकिन गुरु, हुज्जत पैदा करना भी बड़ा पैंतरेबाजी का काम है| बड़ी-बड़ी तिकड़में भिड़ानी पड़ती हैं|”

हिकारत से उसकी बात कटते हुए बोले, “अरे छोड़ो भी, काहे की तिकड़म और काहे का कपट! पच्चीस रास्ते हैं|"

फिर खुलासा करते हुए कहने लगे, "फिल्म के नाम पर विवाद, साहित्यिक चोरी का आरोप, गरमाए हुए मुद्दे पर टिप्पणी, बड़े आदमी के चरित्र पर लांछन, धर्म की आलोचना जैसे अनगिनत तरीके हैं, जिनसे विवाद पैदा किया जा सकता है| एक वाक्य ही तो कहना होता है, बाकी सब काम 'एंकर' करते हैं|"

"बाकी सब काम 'एंकर' करते हैं! मतलब?", किसी नासमझ ने सवाल किया|

उन्होंने बात आगे बढाते हुए कहा, "अरे बछिया के ताऊ, मतलब यह है कि विचारों की दूकान चलाने वाले सेल्समैन जिन्हें तुम जैसे लोग 'एंकर' भी कहते हैं, टीवी पर बैठ कर गला फाड़ते हुए बेपर की उड़ाते हैं, जाली विशेषज्ञ और विश्लेषक पकड़-पकड़ कर लाते हैं और मामले को ऐसा महत्त्वपूर्ण और पेंचीदा बना देते हैं कि लगने लगता है कि क़यामत अब बरपा हुई और तब बरपा हुई|”

हमने भी टीप जमाई, “हाँ, सही बात है| विशेषज्ञ लोग आपस में ऐसे झगड़ते हैं जैसे, बन्दर का तमाशा चल रहा हो| आधे घंटे के कार्यक्रम में एक भी आदमी, एक भी वाक्य पूरा नहीं कह पाता| बात शुरू होने से पहले दूसरा उसे काट देता है”

प्रसन्न होकर, पाँव को चप्पल से निकाल कर, एक पैर के घुटने पर दूसरे पैर का पंजा रखकर, तलुए को अँगूठे से रगड़कर मैल की बत्ती उतारते हुए पूरे उत्साह के साथ कहने लगे, “तो!! आपस में बोलने इसलिए नहीं देते क्योंकि किसी के पास बोलने के लिए कुछ होता ही नहीं| सब मिली भगत हैं, भाई| इसे नूरा कुश्ती कहते हैं| मैच पूरी तरह फिक्स्ड होता है| सब तय करके आते हैं कि मैच के ड्रा रहने में ही सबकी भलाई है| और, अंत में होता भी वही है| आज तक किसी बहस को अंजाम तक पहुँचते हुए देखा है?”

हम उनकी तीखी नजर के कायल हो गए| कमर झुकाकर कोर्निश की और फिर पुराने मुद्दे की ओर उनका ध्यान खींचते हुए कहा, “पेड़ की डाल पर मछलियाँ उगाने वाला क्या चक्कर है? जड़ों के नीचे अंगूर जमाने वाला क्या मामला है? पत्तों की मेज-कुर्सी बनाने वाली क्या बात है? मरे हुओं के साथ बैठकर दावत उड़ाने वाला क्या किस्सा है?”

मुस्कराकर चाय की आखरी घूँट भरी और बोले, “सीधी बात कहता तो इतने लोग इकट्ठे होते? विवादित बयान था, भाई! इस बयान की बदौलत अब यहाँ बैठे सभी लोगों को पता चल गया है कि मौहल्ला समिति ने तुम्हें ‘कविकुल शिरोमणि’ की उपाधि प्रदान की है|”

फिर आँख मार कर बोले, “तो, इसी बात पर हो जाय, एक-एक और चाय!!”
 

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