अपनी बात

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Sunday, October 11, 2015

दुनिया गुम गयी

दुनिया गुम गयी –
शोर मचा हुआ है|
लोग खोज रहे हैं उसे,
कचरे के डिब्बे से लेकर –
ईश-प्रतिमा की बंद मुट्ठियों तक में,
तिजोरियों से लेकर –
भिखारी के बेडौल कटोरे तक में,
दरवाजों के पीछे,
पायदानों के नीचे,
कुम्हार के चाक पर,
वैद्य जी के पाक पर,
हवाओं की सरगोशियों में,
मरघट की खामोशियों में,
सिन्दूर की दमक में,
घुँघरुओं की खनक में|
तलवार की धार,
मान-मनुहार,
कुछ भी तो नहीं छूटा|
तरह-तरह के लोग जो खोजते हैं उसे – दिन भर,
हर शाम आकर मिलते हैं,
बैठते हैं अलाव के पास,
बाँटते है अपने अनुभव और कहते हैं –
“कहीं भी गए हों, पर लगता ऐसा ही रहा,
जैसे बंद ताले के छेद में
आँखें गड़ाए बैठे रहें हों दिन भर|

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