अपनी बात

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Sunday, October 4, 2015

घड़े में तेंदुआ

किसी राजस्थानी गाँव के घड़े में तेंदुआ घुस गया| विचित्र है, ना! ग्रामीणों ने राहगीरों के साथ उसे निकालने के प्रयत्न भी किए, किन्तु असफलता ही हाथ लगी| वन-विभाग के लोग बुलाए गए| उन्होंने भी विचार किया| काफी विचार करने के बाद, बेहोशी का इंजेक्शन लाकर तेंदुए को घड़े की कैद से आज़ाद कराया|
हुआ यह था कि कुँए के पास एक घड़ा रखा था| प्यासा तेंदुआ वहाँ पहुँचा| पानी पीने के लिए उसने घड़े में मुँह डाला| डाल तो दिया, पर निकाल न सका| इधर-उधर टकराता घूमता रहा| पहले तो डरे-सहमे लोग छिपने का स्थान खोजते फिरे| फिर, जब समझ आया कि भय की कोई बात नहीं है, स्थिति सुरक्षित है; उन्होंने उसके साथ सेल्फी खिंचवानी आरम्भ कर दी| छोटे बच्चों को पीठ पर बिठाकर तेंदुए की सवारी का आनंद दिलाना प्रारम्भ कर दिया| कुछ शैतान बच्चे पूँछ खींच कर उसे सताने लगे| वह दहाड़ता तो था, पर उसकी घुटी-घुटी दहाड़ में खून ठंडा कर देने वाली ताब न थी| उसके फौलादी जबड़े, रक्तपिपासु जीभ और तीखी दंतपंक्ति के साथ साथ, पंजे के नखों को दिशा और लक्ष्य दिखाकर घातक बनाने वाली खूनी आँखें भी घड़े के अन्दर बंद थीं| हाड़-मांस के उस विकट शिकारी और मिट्टी के खिलौने में कुछ अधिक अंतर न रह गया था|
अखबार के रिपोर्टर घड़े में बंद तेंदुए को देखने के लिए गाँव की तरफ भागे| आँखें बंद थीं| खोल कर देखा होता तो हर गली, चौराहे, सड़क, तिराहे पर घड़े में बंद तेंदुए दिखाई दे जाते| घर, दफ्तर, मॉल, मैदान भरे पड़े हैं, घड़े के अन्दर बंद तेंदुओं से| कहीं घड़ा लालच का है, तो कहीं मजबूरी का, कहीं क्रोध का तो कहीं प्रेम या डर का| वे घड़े न तो साफ़ देखने देते हैं, न मुकाबला करने देते हैं और न ही प्रचंड प्रतिक्रिया करने देते हैं|
‘विरोध और विद्रोह’ की अभिव्यक्ति हमारा मूलभूत अधिकार है| हमारी चेतना के इर्द-गिर्द लिपटे हुए ये घड़े हमारे इसी अधिकार का हनन करते हैं, हमारी आवाज़ को दबा देते हैं| हमारे हथियारों को भोथरा करके प्रभावहीन बना देते हैं| विवश कर देते हैं कि जीवनदृष्टि संकुचित हो जाए, समझ कुंद हो जाए और ‘अन्धेरा’ जीवन का पर्याय बन कर रह जाए| राजनीति, न्यापालिका, कार्यपालिका और मीडिया लगातार ‘सामजिक-सक्रियता’ और ‘सरोकारों’ की बात करते हैं, उनकी वकालत करते हैं, योजना बनाते हैं और स्पष्टत: उनके कार्यान्वयन के प्रति चिंता भी प्रकट करते हैं| किन्तु, विडम्बना यह है कि जीवन के बड़े फैसले और विशेष रूप से दूसरों के जीवन से सम्बंधित बड़े फैसले प्रच्छन्न रूप से लिए जाते हैं| दिखावे के लिए, निर्णयों और योजनाओं के प्रभाव का आकलन करने के लिए ‘सामाजिक-लेखापरीक्षा’ भी होते हैं, पर दृष्टिकोण पूर्णत: स्वत:प्रायोजित, प्रभाववादी और विस्तारवादी होता है| जो सँस्थाएँ इस प्रक्रिया में शामिल होती हैं, उनके चयन और विश्वसनीयता पर संदिग्ध ही होती है| उन पर प्रश्न उठते ही रहते हैं|
मुझे समस्या ‘प्रश्न उठाने’ को ‘विरोध का रूप’ माने जाने की परिपाटी से है| और, वैसे तो विरोध को भी अनुचित क्यों माना जाए? विरोध को नैतिकता, धार्मिकता, चारित्रिकता, सामाजिकता, संवैधानिकता, विधिक नियमों आदि की चहारदीवारियों में क्यों बाँध कर रखा जाए? किन्तु, जीवन का कटु सत्य यही है कि विरोध को अनुचित माना जाता है| विरोध को अनैतिक, असंवैधानिक, अवैध और गैरपेशेवर कह कर खारिज कर दिया जाता है| सोचे-समझे और व्यवस्थित तरीके से विद्रोह के स्वर को कुंठित कर दिया जाता है| न भी हो, तो विरोध के स्वर को कुंठित करने की कोशिश व्यवस्था के शिखर की ओर से प्राय: होती ही है; एक ओर रूसी क्रान्ति, फ्रांसीसी राज्य-क्रांति, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, चीनी क्रांति जैसे राजनैतिक आन्दोलन और दूसरी ओर यूरोप की पुनर्जागरण क्रान्ति, औद्योगिक क्रांति और अमेरिका की समाज सुधार क्रान्ति जैसे अन्य असंख्य उदाहरण हैं जो इस रुझान के होने की पुष्टि करते हैं| मानता हूँ, अराजकता और उथल-पुथल का भय रहता है, लेकिन विकास की संभावनाएँ भी हैं| विरोध के तरीकों पर निश्चित रूप से बहस करने के लिए तैयार हूँ, किन्तु ‘विरोध’ को प्रवृत्ति के रूप में किसी भी आधार पर खारिज करने का प्रबल विरोधी हूँ|
वापस, घड़े की ओर लौटते हैं - प्राय: होता यह है कि ये घड़े हमें देखने ही नहीं देते कि हमारा मुकाबला किससे है| अदृश्य शत्रु अधिक भयावह लगता है, दुर्दमनीय लगता है| अदृश्यता शत्रु की शक्ति होती है| हमारे विस्तृत समाज में प्रेम करने वालों को मार दिया जाता है, चुड़ैल घोषित करके औरतों की हत्या कर दी जाती है, जींस-फोन को दुराचार का कारण बताया जाता है, बलात्कार को नैसर्गिक प्रवृत्ति घोषित किया जाता है, जाति और धर्म के आधार पर वोट मांगे जाते हैं, औरतों को दबा-कुचल कर केवल भोग्या के रूप में प्रदर्शित किया जाता है| चहुँदिस आर्थिक-सामाजिक मजबूरियाँ नपुंसकता का प्रचार करती हैं, प्रायोजित विचार चिंतन को दिशा देते हैं, राजनैतिक हाशिये पर खड़ा अंतिम हिन्दुस्तानी कराह रहा होता है, लेकिन हम और हमारे जैसे अनंत लोग अपने चेहरे को ढकने वाले घड़े में उलझे रहते हैं| बालकों के कन्धों पर भारी  बस्ता हो या ईंट का बोझा, दोनों का असर सामान ही होता है| हम इस समानता को देख ही नहीं पाते, समझ ही नहीं पाते, उसका विरोध ही नहीं कर पाते, क्योंकि हमारी आँखे बंद हैं| हमें लगता है कि यह विरोध कहीं हम पर ही भारी न पड़ जाए|
चेहरे पर घड़े लटकाए हुए हम कब गहरे गर्त में जा गिरते हैं, पता ही नहीं चलता| एक समय था, जब वृद्धाश्रम बनाए जाते थे| बनाए तो जाते थे, किन्तु उनमें वृद्धों का जाना सामाजिक लज्जा का विषय समझा जाता था| आज ‘कॉरपोरेट हाउस’ खुले-आम वृद्धों के लिए आवास बना रहें हैं, जिनमें घर के बड़े-बुजुर्ग सारी सुविधाओं के साथ रह पाएंगें| बस, उनके परिवार के लोग उनके साथ नहीं होंगे, क्योकि वे उन्हें अपने साथ रख नहीं सकते या रखना नहीं चाहते| इन घरों के विज्ञापन खुले आम छापे जाते हैं| स्पष्टत:, हमने इस परिवर्तन को स्वीकार कर लिया है| यह सामाजिक स्तर पर होने वाला अकेला परिवर्तन नहीं है, यह तो एक बानगी भर है|
चारों ओर जो घट रहा है, उसकी अग्नेयता को ये घड़े समझने ही नहीं देते | पास और दूर घट रही घटनाएँ अंतत: क्या प्रभाव डालेंगी और हमें किस ओर ले जायेंगी, सोचने ही नहीं देते| यह आवश्यक नहीं है कि हम सदा-सर्वदा घटनाओं का भाग ही बनें, किन्तु यह अत्यंत आवश्यक है कि हम घटनाओं को घटते हुए देखें और समझें कि क्या घट रहा है| घटनाओं से चोट खाने से बचने का यही तरीका है| प्राय: घटनाओं से अधिक उनकी आकस्मिकता हमें हताहत करती है|

मित्रों, इन घड़ों को अपनी गर्दन से हटाइए| विरोध कीजिए| सिर को ज़मीन पर इतनी जोर से पटकिये कि ये घड़े खील-खील होकर बिखर जाएँ| अपनी चेतना को अन्धकार की आदत मत पड़ने दीजिए, नहीं तो आपकी पूँछ खींची जायेगी, बच्चे आपकी सवारी करेंगे, आपको सतायेंगे और आप सिर्फ सेल्फियों तक सीमित होकर रह जायेंगे|
चित्र- hindi.webdunia.com तथा news.raftaar.in से साभार
 

3 comments:

  1. भाई जी, कुछ दिनों पूर्व घटी तेंदुए की इस विचित्र सी घटना को वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों के साथ आपने जिस कुशलता के साथ बुना है, वह अत्यंत ही सराहनीय है 😃👌

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  2. भाई, मैं इस बात में पूरा विश्वास करता हूँ कि अक्सर किन्हीं वजहों से हम वस्तुस्थिति को देख, समझ ही नहीं पाते| बस उन वजहों को अपने से दूर करने की देर है, हम प्रतिरोध व्यक्त करने की अपनी स्वाभाविक कुशलता पा लेते हैं|
    प्रतिक्रिया के लिए बहुत धन्यवाद!
    तुम्हारा ही,

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  3. सही बात है सर ! इस विचारोत्तेजक और प्रेरक लेख के लिए धन्यवाद और शुभकामनाएँ।

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