अपनी बात

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Wednesday, September 9, 2015

सवाल

पुरानी कथा है|

ज्ञानपिपासु विद्यार्थी एक प्रसिद्ध गुरु के पास गया| वह दर्शन की शिक्षा लेना चाहता था| विद्वान गुरु ने उसे बहुत देर तक अपने पास बैठाए रखा| जवान लड़का था, खिलंदड़ा और जल्दबाज| उसका धीरज समाप्त होने लगा| गुरु ने उसकी दशा देखी और कहा कि यह जानने के लिए कि वह अधिकारी शिष्य है अथवा नहीं, उसकी परीक्षा ली जायेगी| उन्होंने उसे एक पुस्तक दी और अच्छी तरह पढ़कर पढ़कर एक सप्ताह के बाद आने को कहा|
 
उत्साही छात्र ने पुस्तक का पारायण किया और नियत तिथि पर पूरे विश्वास और तैयारी के साथ गुरु के श्रीचरणों में उपस्थित हुआ| गुरु के पूछने पर उसने बताया कि पुस्तक का घोटा लगा लिया है और विषय भली भाँति समझ में आ गया है| बात सुनकर गुरु मन ही मन थोड़ी देर विचार करते रहे और छात्र मन ही मन सिद्धांतों की पुनरावृत्ति करता रहा| अंत में गुरु ने निर्देश दिया कि पुस्तक को पुन: पढ़ो और एक माह बाद आओ| छात्र थोड़ा निरुत्साहित हुआ, किन्तु फिर भी उसने बात को माना और पुस्तक को मनोयोग से बारम्बार बाँच कर एक महीने बाद फिर से गुरु की सेवा में आया| इस बार उसने बताया कि विषय तो समझ में आ गया, परन्तु कतिपय अंशों में शंका है|

गुरु ने छात्र की बात घ्यानापूर्वक सुनी और उसे पुन: निर्देश दिया कि पोथी को फिर से पढ़ो और परीक्षा के लिए एक वर्ष बाद लौट कर आओ| यद्यपि छात्र को थोड़ी खीझ हुई, तथापि उसने आज्ञा का पालन करना श्रेयस्कर समझा| वह दिन – रात पढ़ने में लगा रहा| एक एक शब्द, वाक्य, अनुच्छेद और अध्याय को एकाग्र होकर कई कई बार पढ़ा|

इस बार, जब एक वर्ष के बाद निर्दिष्ट तिथि को जब वह छात्र गुरु की सेवा में आया तब उसका मस्तक झुका हुआ था| उसने गुरु को बताया कि वह परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो पाएगा| उसे पद पद पर शंकाएँ हैं| हर सिद्धांत को लेकर मन में प्रश्न उठ रहे हैं| विषय पूर्णत: अस्पष्ट है| गुरु ने छात्र की बात को ध्यानपूर्वक सुना और कहा कि वह परीक्षा में सफल हो गया है| मन में उठते प्रश्नों ने उसे ज्ञानार्जन का अधिकारी बना दिया है|

वस्तुत: जिज्ञासा, शंका और प्रश्न ज्ञान के प्रासाद में प्रवेश का द्वार होते हैं|
 

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