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Monday, September 14, 2015

हिन्दी-दिवस की शुभकामनाएँ

‘हिन्दी दिवस’ पर सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएँ|
 
‘हिन्दी दिवस’ को कुछ हिन्दी वाले ‘हिन्दी का श्राद्ध’ भी कहते हुए पाए जाते हैं| किस आधार पर, नहीं जानता| जो भाषा आज ३८,००,००,००० लोगों के द्वारा दुनिया के कोने कोने में बोली जा रही है, जिसकी ४८ बोलियाँ-उपबोलियाँ हैं, जो दुनिया की उन सात भाषाओं में से एक है जिसमें वेब एड्रेस बनाए जा सकते हैं, जिसकी जड़ें लगभग ५००० ईस्वीं पूर्व संस्कृत भाषा तक जाती हैं, जिसका नाम फारसी भाषा के शब्द हिन्द से आया माना जाता है, जिसने उर्दू को बहुत सुन्दरता और सहजता से अपने में समाहित कर लिया है, जिसे दुनिया भर के भाषाविद् सीखने-बोलने के लिए सबसे आसान भाषाओं में से एक मानते हैं; उसके बारे में ऐसी बात कहना शोभा नहीं देता|
 
अध्ययन के मुताबिक़ देवनागरी लिपि जिसमें प्राय: हिन्दी लिखी जाती है, ११वीं शताब्दी में प्रकाश में आयी थी| ‘जोन गिलक्रिस्ट’ द्वारा लिखी गयी पुस्तक ‘ग्रामर ऑफ़ द हिन्दुस्तानी लैंग्वेज’ हिन्दी की सर्वप्रथम छपी हुई पुस्तक मानी जाती है| इसमें उर्दू और अंग्रेज़ी के साथ साथ हिन्दी का भी प्रयोग हुआ| १८०५ में लल्लू लाल की ‘प्रेम सागर’ पूरी तरह हिन्दी में छापी गई प्रथम पुस्तक है|
 
देखने की बात है कि जो हिन्दी भाषा अत्यल्प समय में गंभीर अध्ययन के माध्यम से लेकर बाज़ार में बिकने वाली भाषा जैसे अनेक रूपों में विकसित हुई, उसे किसी बैसाखी की ज़रुरत नहीं हैं| किसी सरकारी सहायता के ज़रुरत नहीं है| हिन्दी को किसी व्यर्थ की भावुकता की भी आवश्यकता नहीं है| किसी अन्य भाषा से उसकी तुलना करने की भी कोई आवश्यकता नहीं है|
 
सबसे महत्वपूर्ण यह है, हमें स्वीकार करना होगा कि हिन्दी अब गाँव के किसी अँधेरे चौके में चूल्हा धौंकने वाली औरत जैसी नहीं रह गयी है, जो खामख्वाह की शुचिता के चक्कर में फंस कर नष्ट हो जाए| हिन्दी आज की नारी जैसी है जिसके लिए शुचिता और पवित्रता के मानदंड बदल चुके हैं| दूसरी भाषाओं को छू लेने मात्र से अब उसका धर्म कहीं जाने वाला नहीं है|
 
हिन्दी की गाड़ी अब सरपट दौड़ चुकी है| देश का आर्थिक विकास हिन्दी को और भी चमकदार, आकर्षक और प्रेय बनाएगा| विश्वास मानिए, यह सब हमारे जीवनकाल में ही हो जाना है|
 
एक बार फिर, हिन्दी दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ|
 

2 comments:

  1. गर्व की बात है कि अब सिर्फ रूदालियों का ही दौर नहीं रहा ,अब तक सरकारी तंत्र तोड़ने का कार्य कर रहा था और जनता जोड़ने की |ऐसे में आपका ये लेख सराहनीय है |
    ''हमें स्वीकार करना होगा की हिन्दी अब गाँव के किसी अँधेरे चौके में चूल्हा धौंकने वाली औरत जैसी नहीं रह गयी है, जो खामख्वाह की शुचिता के चक्कर में फंस कर नष्ट हो जाए| हिन्दी आज की नारी जैसी है जिसके लिए शुचिता और पवित्रता के मानदंड बदल चुके हैं|''

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    1. धन्यवाद, मिश्र जी|
      मुझे प्रसन्नता है कि आप जैसे विचारक इस चिट्ठे के नियमित पाठक हैं|
      सही बात तो यहे है कि दौर बदल चुका है| हिन्दी किसी बच्चे का खिलौना नहीं है जिसे संभाल कर रखने की आवश्यकता हो| मेरा दृढ मत है कि अब हिन्दी सर्वतंत्र स्वतन्त्र है, मज़बूत है और दुनिया के कारोबार में घुली मिली है| चोट लगने के डर से प्रतियोगिता से हटाकर यदि हम भाषा को घर में बैठाने की बात सोचेंगे तो हम उसका कोई भला नहीं करेंगे| उसे टकराने दीजिए, अपना रास्ता खुद बनाने दीजिए और मज़बूती से उभर कर आने दीजिए| तभी यह भाषा सर्वमान्य और सर्वग्राह्य होगी|

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