अपनी बात

"ब्लॉग, जो विधाओं की सीमा से परे होकर अभिव्यक्ति की बात करता है, जो विचार की बात करता है चाहे वह कहानी, हास्य, व्यंग्य, कविता, समीक्षा, लेख, डायरी, भाषण, निबंध जैसे किसी भी रूप में हो; जहाँ भावना की प्रधानता भाषा से किसी भी रूप में न्यून नहीं है; जिसके विषय में घर, परिवार से लेकर फिल्म, नाटक, साहित्य, समाज, खेल, राजनीति, अर्थशास्त्र, कला आदि सभी आ जाते हैं|"

Tuesday, September 22, 2015

मतलब

मुंडेर पर बैठे पहाड़ी कौए को देख
हुलस पडती थी माँ –
“मेहमान आने वाला है.....”
और आज –
“अब कौन...”

हिचकियाँ लगते ही मन आह्लादित होता था –
“कोई अपना याद कर रहा है....”
“कौन हो सकता है, कौन”... अनुमान लगने लगते थे|
और आज –
“मतलबी दुनिया... न जाने किस स्वार्थ से....”

तवे पर रोटी के मुडते ही नानी ने कहा था –
“किसी कुटुम्बी से भेंट होगी...”
और आज –
“लोगों को काम नहीं है क्या....”

शब्द बदल गए, अर्थ बदल गए,
समय बदल गया, लोग बदल गए...
ज़िंदगी का मतलब बजट, अपना कमरा,
और बच्चों की पढाई में ही सिमट गया है|
अब हम प्रैक्टिकल हो गए हैं...|
 

No comments:

Post a Comment