अपनी बात

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Tuesday, September 29, 2015

‘स्माईली’ का शून्य

हद्द होती है, यार!
 
हँसने वाला भी स्माईली और रोने वाला भी स्माईली| क्या लिखना है, यह समझ न आये तो स्माईली बना दो| अगर ज़्यादा ख्यालात दिमाग में एक साथ कौंध जाएँ, तो भी स्माईली बना दो| भावनाएँ आपस में जुड़ने लगें तो भी और अगर आपस में टकराने लगें तो भी; सबका एक ही उपाय - स्माईली| आपने तो कुछ बिंदु, आड़ी टेढ़ी लाइने और दो-चार कुछ अन्य दूसरे संकेत बना कर छुट्टी पाई| उधर, बेचारा पढ़ने वाला मगजपच्ची में लगा है कि आखिर यह बला क्या है| कई बार तो सुराग ही नहीं मिलता कि कहने वाला असल में कहना क्या चाहता है| पूछने की जुर्रत कर नहीं सकता| आज के स्माईली-प्रधान समाज में बेइज्जती होने का डर रहता है – ‘बताइए, इस देहाती को यह भी नहीं पता कि इस स्माईली का क्या मतलब है|’ अपनी तो हुई ही, साथ में देहातियों की और करवा दी!
 
अपने को आधुनिक समझने वाले जान लें कि स्माईली कोई नई सत्ता नहीं है| पराजित प्रबुद्ध लोगों ने स्माईली का प्रयोग करके विद्योत्तमा जैसी विदुषी नारी कालिदास सरीखे मूरख के साथ ब्याह दी थी| यहाँ स्माईली लिखी जाती है, वहाँ तो बिल्कुल जीवंत थी, कतई ‘लाइव’| फर्क यह है कि वहाँ स्माईली ने पेड़ की गलत डाल काटने वाले गाउदी को ‘अस्ति कश्चित् वाग्विशेष:’ वाक्य को अमर बनाने वाला, अनुभूतियों और मनोभावों का माहिर महाकवि बना दिया| और, यहाँ अपनी तो अपनी, साथ में और भी चार-छह डाल काटने के लिए पैनी कुल्हाड़ी पकड़ाई जा रही है| भावनात्मक निरक्षरता का पूरा प्रसार हो रहा है|
 
स्माईलियों का प्रयोग करने में सबसे बड़ा लाभ यह है कि आपको शब्दों की सही वर्तनी जानने की ज़रूरत नहीं होती| जहाँ भी संभ्रम हुआ, ठूँ से स्माईली ठोक मारी| स्माईली की औकात उसके भेजने वाले के अनुसार आँकी जाती है| स्माईली ठोकने वाला बड़ा, तो स्माईली का अर्थ बड़ा; उसकी भावना बड़ी| चिपकाने वाले की भावना कुछ भी हो, पाने वाला अपने स्वभाव और भेजने वाले की हैसियत के हिसाब से अर्थ निकाल लेता है| आप सूत्रकार हैं, अर्थ स्पष्ट करने की ज़िम्मेदारी आपकी हैं ही नहीं| अगणित भाष्यकार फोन और कम्प्यूटर के कुंजी पटल पर अपनी अंगुलियाँ और अँगूठे फिराते घूमते रहते हैं, ये तो उनका काम है| कहा जाता है, अगर मल्लीनाथ न होते, तो कालिदास भी कालिदास न होते|
 
‘रेडीमेड’ माल का ज़माना आया और चला गया| अब ‘रेडी टू यूज़’ और ‘यूज़ एंड थ्रो’ का चलन है| चाहे स्माईली हों, जूते-कपड़े हों या मानवीय सम्बन्ध, प्रथा एक ही है| संभालकर रखने का समय गया| संभालकर रखने योग्य बनने-बनाने का चलन समाप्त हुआ| तराशकर ख़ूबसूरत बनाने का दस्तूर दूर की बात हो गयी| पानी पिया, बोतल फेंकी और जय राम जी की| प्लास्टिक चुगने वाले मैले-कुचैले बच्चे बोतल इकट्ठी करते हैं और पाँच-दस पैसे फी बोतल के हिसाब से कबाड़ी के यहाँ बेच आते हैं| जो पैसे मिलते हैं उनसे शाम के नशे-पत्ते का इंतज़ाम हो जाता है| सम्बन्ध तो इस काम के भी नहीं| इकट्ठे करलो तो फँस जाओ - न उगलते बनें, न निगलते| अब कौन रिश्तों की गठरी कंधे पर लादे डगर डगर फिरे| जब ज़रुरत पड़ी, बाज़ार से खरीदे, प्रयोग किये| ज़रुरत ख़त्म, रिश्ते ख़त्म| एक दोस्त बता रहा था कि बड़े शहरों में मकान छोटे होते हैं| स्टोरेज का बूता कम होता है, इसीलिए ‘यूज़ एंड थ्रो’ का सिद्धांत हिट है|
 
स्माईली की तहजीब ‘कापी-पेस्ट’ की तहजीब है| ये नए युग की अभिव्यक्तियाँ हैं| जितनी आसानी से दिल के साथ दो लाल गुलाब भेज कर ‘आई लव यू’ कह दिया जाता है, उतनी ही सहजता से कान के सामने बन्दूक का नन्हां सा इशारा लगाकर ‘टाइम टू ब्रेक अप’ भी कह दिया जाता है| हर दिल, दिमाग जल्दी में है| किसी तरह अपनी बात कहने की रस्म अदायगी हो जाए, जान छूटे| स्माईली मिला है, तो बदले में भेजना भी है| बुरा न मान जाएँ| उधर ध्यान बस इस बात पर रहता है, जवाब आया कि नहीं| क्या आया, इससे सरोकार कम ही है| जनता की दिलचस्पी अपनी बात जताने में ही है, उसका असर देखने की फुर्सत किसे है| पहले ज़मीन तैयार करके फूलों के बीज लगाए जाते थे| पौधे निकलने का इंतज़ार किया जाता था| छोटी से कली को चटखते और फूल बनकर खिलते देखा जाता था| इंतज़ार था, धीरज था, सार्थकता थी| लेकिन अब तो फूल लगा पौधा गमले सहित बाज़ार से लाया जाता है| अब गर्व है, दाम है, हिसाब-किताब है| ये तो वे भावनाएँ हैं, जो बाजार से खरीदी जाती हैं और गिफ्ट-रैप करके आगे बढ़ा दी जाती हैं| 
 
एक युवा मित्र कहने लगे, “स्माईली भी एक भाषा है| भावना, प्रतिक्रिया, उत्तर, राय, उपदेश, परामर्श, मंत्रणा और मशवरे की भाषा है| संकेत की भाषा है|” उन्होंने प्रश्न दागा, “संकेत की भाषा का प्रयोग करने में बुरा क्या है?”
 
उनकी बात का उत्तर नहीं जानता| पर, इतना जानता हूँ कि ये सभी अभिव्यंजनाएँ, जो उन्होंने गिनाई हैं, स्माईली की भाषा में जितनी सरलता से लिखी जाती हैं, उतनी ही सहजता से डिलीट भी कर दी जाती हैं| न भेजने के बाद उधर ध्यान रहता है कि क्या भेजा था, और न ही डिलीट करने के बाद इधर ध्यान रहता है कि क्या पाया था| इधर भी शून्य और उधर भी शून्य|
 
आपको कोई उत्तर सूझे तो बताइयेगा, हिचकियेगा नहीं!
 

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