अपनी बात

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Saturday, September 26, 2015

मज़े की दुनिया

हेमिंग्वे ने कहा, “जब आप मजेदार चीज़ें करना बंद कर देते हैं, तब समझिये कि आप समाप्त हो जाते हैं|”

मज़ा कोई अर्वाचीन युग की संकल्पना नहीं है| इसके लिए पुरातन काल में भी विविध उद्योग किये जाते थे| ये प्रयोग क्रमश: कलाओं के रूप में विकसित होते गए| दण्डी ने कहा कि कलाएँ कामऔर अर्थके ऊपर आश्रित होती हैं – “नृत्यगीतप्रभृतयः कलाः कामार्थसंश्रया:|” मज़े के खोजी वात्स्यायन और शुक्राचार्य ने कामसूत्र तथा शुक्रनीति में चौसठ कलाओं की गिनती करा दी है| ये चौसठ कलाएँ या तो मज़े के लिए होती थीं या मज़े को बढ़ाने के लिए| ये जीवन में रस घोलती थीं| आहिस्ता आहिस्ता कलाएँ विद्याओं के रूप में प्रतिष्ठित होती चली गयीं| गान, वाद्य, नृत्य, नाट्य, खेल, काव्य, उच्चाटन, जादूगरी, चित्र, बेल-बूटे बनाना, प्रतिमा बनाना, पाक, काष्ठ, गृहनिर्माण, लेखन, समस्यापूर्ति, भाषा का ज्ञान, कोशों का ज्ञान, छन्दों का ज्ञान, कपड़े और गहने बनाना, इत्र-तैल आदि सुगन्धित पदार्थ बनाना, दन्त-वस्त्र-अंगादि को रंगना, हार-माला आदि बनाना, केशसज्जा, मूल्यवान धातुओं तथा रत्नों की परीक्षा, कीमियागरी, मणियों के रंग को पहचानना, रत्नों को काटना, मणियों की फर्श बनाना आदि ऐसी ही कलाएँ हैं जिनका जन्म तो आनंदप्राप्ति के लिए हुआ था, किन्तु विकास विद्याओं के रूप में हुआ|

मज़ा किसी का गुलाम नहीं होता| आता है तो टाट के चोगे में भी आ जाता है, और नहीं आता तो मखमली लिबासों में भी नहीं आता| अक्सर आनंद को आनंद के उपादानों की कीमत के साथ जोड़ कर देखा जाता है| बस यहीं जीवनशास्त्र को समझाने में भूल हो जाती है| दार्शनिक साहित्यकार जॉन हक्सले फटे हुए जूते पहनने में आनंद का अनुभव करते थे| वे नए जूतों को भी फाड़कर पहना करते थे| हमारे मित्र शुक्ला जी का छोटा सा पुत्र एक पुरानी तिपहिया साइकिल चलाता है| साइकिल के रंग उड़े हुए हैं, सीट फट चुकी है, पहिये टेढ़े-मेढ़े हो गए हैं और हैंडल के निर्देश को मानने से इनकार करने लगे हैं लेकिन छोटा सा बालक जब उस साइकिल की सवारी करता है तो उसकी मुखमुद्रा और बदन की चपलता बताती हैं कि सर से पैर तक वह आनंदोल्लास में सराबोर है|

मज़ा तब आता है जब ज़िंदगी के प्रति ललक रहती है| हमारे एक और मित्र हैं| उन्हें सिगरट की खाली डिब्बियाँ इकट्ठी करने की खब्त है| कभी कभी जब मौज में होते हैं तो पूरे घर में उन डिब्बियों को एक कतार में खड़ा कर देते हैं| आड़ी-तिरछी धूमती हुई पंक्ति किताबों से बने पुलों के ऊपर से गुजरती हुई पूरे घर में फ़ैल जाती है| फिर वे इत्मीनान से एक डिब्बी को उंगली का टहोका देकर गिराते हैं और एक के बाद एक गिरती हुई डिब्बियों को देखने में मगन हो जाते हैं|
 
बासीपन मज़े को खा जाता है| मज़े के लिए कल्पनाशीलता आवश्यक तत्व है| उसके बिना नयापन नहीं आता| कुछ लोग तैरने के शौक़ीन होते हैं, लेकिन एक ऐसे शौक़ीन भी हुए हैं जिन्होंने तैरने के लिए लकड़ी से बना स्वीमिंग सूट ईजाद किया| एक और तैरने के अनुरागी चिन्तक हुए है, जिन्होंने साइकिल के ट्यूब से ही स्वीमिंग सूट बना डाला| इन कल्पनामय तिकड़मों और तदबीरों से कम से कम मेहनत के साथ अधिक से अधिक मज़ा लिया जा सकता है| ऐसे ही एक महाशय ने अपनी साइकिल के पहिये प्लास्टिक के गुब्बारों से बना डाले जिसकी सहायता से वे बिना भीगे पानी पर साइकिल की सवारी का मज़ा लेते थे|
 
मज़ा समय का मोहताज नहीं होता| उसके लिए घड़ी में समय स्थिर करने की आवश्यकता नहीं होती| वह तब आता है, जब आप उसे आने देना चाहते हैं| कुछ मजेदार काम ऐसे होते हैं जिन्हें कभी भी किया जा सकता है| अपने व्यक्तिगत अनुभव से कह सकता हूँ कि दोस्तों के साथ गप्पबाजी, अनूठी बातें छौंकना, परनिंदा और आत्मश्लाघा में जो मज़ा है, किसी और में नहीं| समय की सीमाएँ इस मज़े को नियंत्रित नहीं कर सकतीं| पत्नी भले ही घर पर प्रतीक्षा में कुढ़ती रहे, पर यार लोग जब महफ़िल में बैठ जाते हैं, तब किसी बात का ध्यान नहीं रहता|
 
आनंद और उससे उद्भूत संतोष का संसार बहुत विचित्र होता है| सच्चा आनंद पाने के लिए थोड़ा या कईं बार बहुत सनकी और झक्की होना पड़ता है| अवध के नवाब वाजिद अली शाह स्त्री वेश में प्रकट होने में आनंद का अनुभव करते थे| तुर्कमेनिस्तान का सनकी शासक बेडेमुखामेडेव ने कार या बाइक चालकों को छह महीने में एक बार सात सौ बीस लीटर पेट्रोल और चौसठ किलो गैस मुफ्त देने का आदेश दिया था| उसे अपनी इसी सनक में आनंद प्राप्त होता था| डॉन जॉन लकड़ी का ताबूत हमेशा अपने कमरे में रखते थे| जब मौज में आते तो उसमें उसमें सो भी जाया करते थे| उनके लिए आनंद का यही साधन था| हमारे जोशी जी को बागबानी से अधिक तुष्टि किसी कार्य में नहीं मिलती| उन्हें पेड़-पौधों से बात करने की सनक है| जेठ की दोपहरी में भी वे प्राय: पेड़ पौधों से बतियाते मिल जाते हैं| अशद भाई गृहसज्जा में ही रस का अनुभव करते हैं| एक एक चीज़ को करीने से सजाते हैं और घंटों तक मुग्धभाव से उसका अवलोकन करते रहते हैं| हमारे परममित्र चकौड़ी दास आत्मसज्जा में आनंद लेते हैं| इस उद्देश्य की पूर्ति करने के लिए उन्होंने अपने पास ऐसे ऐसे चुनींदा सुगन्धित पदार्थ, लोशन और वस्त्र संग्रहीत कर रखे हैं; जिन्हें देखकर कोई भी रूपसी उनसे डाह करने लगे|
 
कुछ लोग परपीडन में मज़ा लेते हैं| दूसरों की पीड़ा उनके लिए मनोरंजन का साधन बन जाती है| धरती पर जन्मे परपीडकों का सिरमौर सनकी ईदी अमीन जिससे प्रेम करता था, उसे खा जाया करता था| रोम का शासक नीरो देश में दंगे करवाकर स्वयं संगीत का आनंद लेते हुए प्रसन्न होता था| एक गार्डन स्टोन नामक लार्ड हुए हैं| उनका अजीब ही शगल था| मज़े की अजीब ही परिभाषा थी| वे हमेशा अपने कमरे में मानव-खोपड़ी, अस्थि-पंजर, डरावने चित्र, टूटी-फूटी चीजें रखते थे| उन्हें दूसरों को अपने कमरे में बुलाकर डरता हुआ देखने में ही आनंद आता था|
 
कुछ लोग आत्मपीडन में ही आनंदित होते रहते हैं| स्वयं को चोट पहुंचाना, अपने शरीर को जला देना, अपने अंगों को छेद देना, शरीर पर चीरे लगा देना जैसे अजीब से लगने वाले कार्य ये लोग करते रहते हैं| अगर उचित समझें तो स्वयं को भावनात्मक रूप से सताकर दर्द भरे गीत लिखने वाले कवि-महाकवियों को भी आप इसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं|
 
कुछ आत्मविमुग्ध जन स्वयं को दर्पण में निहारकर प्रसन्न होते हैं तो कुछ सौन्दर्य के रसपान से आनंदित होकर बहिर्गमन में रत हो जाते हैं| अपने आसपास देखें तो अनेक उदाहरण पा सकते हैं|
 
मुफ्त का मज़ा भाग्यशालियों को ही मिला करता है| टी टेस्टर और वाइन टेस्टर ऐसे लोग होते होते हैं जो अपनी रूचि को अपनी आजीविका बना लेते हैं और दूसरे के खर्चे पर मज़े मारते हैं| वैसे, सरकारी खर्चे पर मज़े मारने का आनंद कुछ और ही है| विदेश यात्राएँ, पाँच सितारा होटलों में आवास, सुरा-सुन्दरी का सेवन, दिव्य भोज्य पदार्थों का भोग और महंगे साधनों से आवागमन अगर मुफ्त में मिल जाए तो आनंद तो स्वाभाविक रूप से कई गुना हो जाता है| हर्र लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा होय|
 
कुछ मज़े रत्नों की खान की तरह होते हैं, जिन्हें सतही तौर पर देखने से कुछ दिखाई नहीं देता| उन्हें समझने के लिए आनंद के मूलभूत सिद्धांत याने व्यक्तिगतता के सिद्धांत को पहले समझना होता है| बचपन में मज़े के लिए बड़े अनोखे काम किये जाते हैं| रास्ते चलते साथियों को टंगड़ी देकर गिरा देना और ताली बजाकर प्रसन्न होना सभी बालकों को बहुत प्रिय होता है| विशेष ध्यान इस बात का रखा जाता है कि जिस समय यह घटना घटे आस पास कुछ दर्शक अवश्य उपस्थित हों| बिजली के खम्भे पर पत्थर मार कर टन्न की आवाज पैदा करना और उसकी गूँज को ध्यान से सुनना सभी बालकों को बहुत आनंद देता है| प्राय:, कम उम्र के सभी बालकों को सद्य केशकर्तन कराए साथी की खोपड़ी पर उँगली से ठेका बजाना अपूर्व आनंद देता है| गंगा दशहरे पर जब सारा परिवार धार्मिक भाव से गंगा-स्नान कर रहा होता है तब बच्चे लोग पानी के ऊपर पत्थर फिसलाने में व्यस्त रहते हैं| एक और काम है जिसमें बच्चे ही नहीं बड़े भी रस लेते हैं और वह है विवाद| कईं बार विवाद का कारण कुछ नहीं होता, दोनों पक्षों को यथार्थ का ज्ञान नहीं होता पर केवल बहस के उद्देश्य से बहस की जाती है| दोनों पक्ष यह तक नहीं जानते कि उन्हें सिद्ध क्या करना है, लेकिन बहस बदस्तूर जाती रहती है| सूत न कपास, जुलाहे से लट्ठमलट्ठा|
 
उसे मज़ा कहिये, आनंद, हर्ष, उल्लास, सुख, रस, तुष्टि या कुछ भी कहिए; होता बहुत अद्भुत और लोकातीत है| मन उसमें रमता है| विश्वास मानिये, वह तर्क और युक्ति की हद से दूर, उम्र-वर्ण-लिंग-वर्ग के प्रतिबन्ध से परे, खून की रवानगी सा, साँस के आरोहअवरोह जैसा मन को अकारण ही अच्छा लगता है| लोकलाज और भय उसके प्रवाह में बह जाते हैं| विशुद्ध आनंद उसका प्रतिफल होता है| उसकी कैफियत ईश्वरीय साक्षात्कार की सी होती है| योगी के योग, भोगी के भोग, साधक की साधना और भक्त की भक्ति जैसा आवेगपूर्ण होता है| कहने का अर्थ हैं - जीवन मज़े के लिए है, मज़ा जीवन के लिए| कोई कंजूसी मत कीजिये| यात्राएँ कीजिए, आराम कीजिए, खेलिए, पढ़िए, लिखिए, जो करना है मुक्तभाव से कीजिए और पूरे उत्साह के साथ प्राणधारण करने के सुख लीजिए| मनोरंजन के लिए विकसित, वैचित्र्य उत्पादित करने वाली, जीवनोपयोगी, साहित्यिक, श्रृंगारपरक या कैसी भी सार्थक या अर्थहीन दिखने वाली विद्याओं को अपनाइए और भरपूर मज़े लीजिये तथा ज़िंदगी को नए आयाम, नए अर्थ और नये विस्तार दीजिए| पानी की सतह पर तेल की तरह अपने शौक को जीवन में फैलने दीजिए, उसमें नवीन और अक्षत बिम्ब स्वत: दिखाई देने लगेंगे|


 

1 comment:

  1. मज़े की दुनिया...आनंद आ गया

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