अपनी बात

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Tuesday, September 22, 2015

फुदकती गौरय्या


याद हैं बचपन के दिन -
घर की दहलीज पर,छत की मुंडेर पर,
आँगन में नल के आस-पास
गौरय्या फुदकती थीं|

छोटीछोटी उड़ाने भरती थीं,
बेखौफ....
दरवाज़े की सांकल से कपड़े सुखाने के तार तक,
दीपक रखने के आले से रोशनदान तक|
कहीं ज़रा सा पानी मिला नहीं
कि पंख फड़फड़ा कर नहाना शुरू|
धूप में पंख सुखा लेती थीं,
चोंच से संवार लेती थीं|

लड़ती भी थीं आपस में
शोर मचाकर, उछल उछल कर
पर, कभी एक दूसरे को काटते
या चोंच मारते नहीं देखाउन्हें|

माँ कई बार रोटी के नन्हें टुकड़े करके
डाल देती थीं कटहरे पर -
थोड़ा सा खाती थीं,
और थोड़ा सा ले जाती थीं,
नन्हें चूजों के लिए
जो मोखले के घोंसले में दुबके होते थे,
मटमैली रंगत वाले, बेपर,
चोंच खोले चुग्गे के इंतज़ार में|

नानी ने बताया था नर की पहचान–
कालीसी दाढी और छाती का निशान,
और मादा की पहचान पंखों का कटान|
बच्चे पूरी पूरी गर्मियों की दोपहरियाँ बिता देते थे
यह समझाने में कि कौन नर और कौन मादा|

पता नहीं क्यों जब से बड़े हुए हैं,
गौरय्या दिखनी बंद हो गयीं हैं|

वजह का पक्का पता नहीं,
हाँ,मेरी बेटी बता रही थी -
अब पेड़ नहीं उगते, झाड़ियाँ नहीं उगतीं,
छोटे छोटे गड्ढों में पानी नहीं जमा होता,
नल नहीं होते, दीवारों में आले नहीं होते,
खेतों में चिड़ियों के नाम के दाने नहीं छोड़े जाते|
वैसे, खेती अब भी होती है–
मोबाइल के टावरों की,आसमानचूमती इमारतों की|
पेड़ भी उगते हैं –लोहे, रेत और सीमेंट के|
दानेअब भी रखे जाते हैं –बड़े बड़े गोदामों में
 
पर, नन्हीं गौरय्या को यह सब भाता नहीं|
इसीलिए वह घबरा जाती हैं,
और जाकर छिप जाती हैं.... कोर्स की किताबों में|
 

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