अपनी बात

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Monday, September 21, 2015

डायरी के पन्नों से

२०-९-२०१५
देहरादून
११:३० रात्रि

प्रिय डायरी,

आज का दिन बेहद थकान भरा रहा| सुबह से शाम तक किसी न किसी काम में उलझा रहा| जीवन-चर्या कुछ ऐसी हो गयी है कि रविवार का दिन आराम करने के स्थान पर सप्ताह भर के अवशिष्ट कामों को पूरा करने में बीत जाता है| अगर थोड़ा बहुत समय बचे, तो वह अगले सप्ताह की तैयारियों में खर्च हो जाता है| काम करना बुरा नहीं है| काम करना तो हमारा विशेषाधिकार है| समस्या काम को लेकर नहीं है| काम की अधिकता को लेकर भी नहीं है| समस्या है काम के उद्देश्य को लेकर| हम काम करने के लिए काम नहीं करते| ताकत, अधिकार, धन, प्रभाव और पहुँच बनानी है; तो काम तो करना ही पड़ेगा – हमारी ऐसी सोच होती जा रही हैं|

रूढ़ि तो यही है कि रविवार का दिन सप्ताहपर्यंत निरंतर वर्धित होने वाली मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक जीर्णता से उबरने करने के लिए होता है, पर आज बदलते समय के साथ जीवन के मानदंड बदल रहे हैं| आवश्यकताएँ बदल रही हैं| प्राथमिकताएँ बदल रहीं हैं| संतुष्ट होना हीनता और दुर्बलता का चिह्न बनता जा रहा है| बारीक भावनाओं के पोषण के लिए हमारे पास समय नहीं होता| उन्हें हम कुछ समझते ही नहीं| कोरी भावुकता कहकर आगे निकल जाते हैं| जब तक उनका महत्त्व समझ में आता है, तब तक प्राय: बहुत देर हो जाती है| उम्र की धूप ढल कर जीवन चहारदीवारी से नीचे उतर चुकी होती है| आसन्न अन्धकार के प्रेत झुरमुटों में बैठे दिखाई देने लगते हैं| अब समझ आने से क्या लाभ| का वर्षा जब कृषी सुखाने|

कईं बार सोचता हूँ, जीवन में भाग-दौड़, आपाधापी किस लिए है! ऐसा क्या है, जो हमें लगातार इधर से उधर भटकाता रहता है? क्या मृगमरीचिका है, जो क्षणभर सुकून से बैठने नहीं देती| कहीं हमारे दिलों के भीतर बैठा लालच ही तो नहीं है| आज के मुहावरे में उसी लालच को कभी महत्त्वाकांक्षा कहा जाता है, तो कभी आगे बढ़ने की ललक| उस लालच का रूपाकार इतना बड़ा होता जाता है कि हम उसपर अपना पूरा जीवन वार देते हैं|

प्रिय डायरी, तुम तो शान्ति से अलमारी में बैठी रहती हो| तुम्हें जीवन की जटिलता का अंदाजा ही नहीं रहता| तुम्हें लगता है कि हमारा जीवन भी तुम जैसा है, जिसमें उग्रता, विक्षोभ, अशांति और हंगामा नहीं है| दाएँ-बाएँ की चिंता ही नहीं| यथार्थ यह है कि हमारी स्थिति तुमसे बहुत अलग है| सच कहूँ, हम सब पाना चाहते हैं| जो हाथ में आ जाए उसे जकड़े रहना चाहते हैं| हम भूल जाते हैं कि अनावश्यक इच्छाओं के भंवर में पड़ कर हम अपने जीवन का रस खो देते हैं, अपने जीवन की स्वतंत्रता से हाथ धो बैठते हैं| लोभ की भूल-भूलैया में फँसकर नैतिक और आत्मिक पराधीनता की राह पर चल पड़ते हैं|

बचपन में सुना था, बन्दर पकड़ने वाले छोटे मुख की हंडिया में अनाज भरकर रख देते हैं| बन्दर हंडिया से दाने निकालने के लिए अपनी मुट्ठी बंद तो कर लेता है, लेकिन बंद मुट्ठी को बाहर नहीं निकाल पाता| हमारा भी हाल कुछ ऐसा ही है| हम सब हंडिया के संकीर्ण मुँह में अपनी मुट्ठी फँसाए बैठे हैं| अनाज के दाने हमारे हाथ में तो हैं, लेकिन हमारे किसी काम के नहीं हैं|

दरअसल हम यह समझ ही नहीं पाते कि हमें क्या चाहिए और कितना चाहिए|

फिर मिलते हैं|
तुम्हारा,
अरविन्दनाभ
 

1 comment:

  1. हम भूल जाते हैं कि अनावश्यक इच्छाओं के भंवर में पड़ कर हम अपने जीवन का रस खो देते हैं, अपने जीवन की स्वतंत्रता से हाथ धो बैठते हैं| लोभ की भूल-भूलैया में फँसकर नैतिक और आत्मिक पराधीनता की राह पर चल पड़ते हैं| बहुत खूब - आज की आप धापी का शाश्वत सत्य --

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