अपनी बात

"ब्लॉग, जो विधाओं की सीमा से परे होकर अभिव्यक्ति की बात करता है, जो विचार की बात करता है चाहे वह कहानी, हास्य, व्यंग्य, कविता, समीक्षा, लेख, डायरी, भाषण, निबंध जैसे किसी भी रूप में हो; जहाँ भावना की प्रधानता भाषा से किसी भी रूप में न्यून नहीं है; जिसके विषय में घर, परिवार से लेकर फिल्म, नाटक, साहित्य, समाज, खेल, राजनीति, अर्थशास्त्र, कला आदि सभी आ जाते हैं|"

Friday, September 18, 2015

गाली मीमांसा

अहहहा! एक बार ज़रा जीभ घुमाकर भावप्रवण स्वर में गाली देकर देखिये कितना आनंद, संतोष और चैन मिलता है| तरावट आ जाती है| मनोभाव कुछ ऐसा हो जाता है मानो विद्रोह सफल हो गया हो, शत्रु का तख्ता-पलट हो गया हो| ऐसी ही होती है गाली| गाली के लिए फटकार, झिड़की, आक्षेप, दुर्वचन, ताना, बदज़बानी, लानत, धिक्कार आदि शब्दों का भी प्रयोग किया जाता है| गाली के बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा गया है, इसलिए गाली के भेद आदि विषय को मैं नहीं छू रहा हूँ| इतना अवश्य कहना चाहूँगा कि गाली हमेशा दूसरे को कष्ट पहुँचाने के लिए नहीं दी जाती| अधिकांश अवसरों पर वह केवल आत्मतोष के लिए ही उच्चारित की जाती है| वस्तुत: यह बात गौण है कि दूसरे पर गाली का क्या प्रभाव पड़ रहा है, मुख्य बात यह है कि गाली देने से स्वयं को कितना आत्मिक आनंद प्राप्त हो रहा है|

हमारे मित्र चकौड़ी दास अक्सर कहते हैं, “गालीबाजी ‘कला’ और ‘विज्ञान’ का अद्भुत समन्वय है| ‘कलात्मकता’ गाली देने की समयानुकूलता या टाइमिंग में छुपी है तो ‘विज्ञान’ गाली की प्रभावशीलता या पोटेंसी में निहित होता है|”

गलियों का भारतीय इतिहास बहुत पुराना है| श्रीमद्भागवत् महापुराण में वर्णन आया है कि संसार में जुए के अड्डे और शराबखाने आदि ऐसे स्थान हैं, जहाँ सबसे अधिक अपशब्दों का प्रयोग होता है| महाभारत में गालियों की परम्परा का उल्लेख है| शिशुपाल का प्रसंग तो सभी को याद ही होगा| उसने सौ गालियाँ दीं थी| जिसका अर्थ है, गालियों और अपशब्दों का तत्कालीन कोश काफी विकसित रहा होगा| राम जी के विवाह के अवसर पर जनकपुरी की औरतों ने मीठी-मीठी गालियाँ देकर गुरु वसिष्ठ और विश्वामित्र जैसे ब्रह्मर्षियों का फेरों पर बैठना मुश्किल कर दिया था| वैसे तो आजकल लेडीज़ संगीत का ज़माना है पर फिर भी गाँव देहात में आज भी शादी ब्याह हो तो बन्ने और बन्नी की तरफ से गालियों की बौछार कर दी जाती है| एक तरफ मंडप में वेद मन्त्रों का उच्चारण हो रहा होता है और दूसरी ओर गालियों के गीत विविध सुरों में गाये जा रहे होते हैं –

ये समधी सुनिए, मधुर स्वर गालियां,
बहिनी तुम्हारी बजार बीच नाचे,
हमारे भैया बजाते हैं तालियां।

मानस में एक और प्रसंग हैं, जब सुमंतजी राम, लक्ष्मण से मिलते हैं और राजा दशरथ का सन्देश सुनाते हैं तब लक्ष्मण जी महाराज द्वारा गलियों का प्रयोग किया जाता है| शिष्ट महात्मा तुलसी बाबा अपनी बनाई सीमा तो नहीं लांघते, पर फिर भी कह उठते हैं –

पुनि कछु लखन कही कटु बानी । प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी ॥
सकुचि राम निज सपथ देवाई । लखन संदेसु कहिय जनि जाई ॥

राजनैतिक लोग गाली देने और गाली खाने दोनों ही कलाओं में पारंगत होते हैं| किसी भी राजनैतिक सभा में चले जाइए, आप खाली हाथ नहीं लौटेंगे| अध्यापकों ने चौधरी साहब का बायकाट करने के लिए बाजू पर काले रिबिन बाँधकर नारा लगाया “चौधरी साहब, वापस जाओ|” चौधरी साहब ने ठेठ हरियाणवी लहजे में गाली देकर कहा, “जब चौधरी दुनिया में आया, तो उसकी माँ ने अस्सी कली का काला घाघरा पहन रखा था| वो तब वापस नहीं गया, इन कत्तरों से क्या होगा|” गांधी जी ने १९०९ में संसदीय लोकतंत्र को वेश्या कह दिया था| यह दीगर बात है कि अँगरेज़ महिलाओं के हाय-तौबा मचाने पर उन्होंने उसे बाँझ के रूप में संशोधित कर दिया था|

गाली देना हमारी  सभ्यता और संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है| महाराष्ट्र के सुखेड और बोरी गांव में प्रतिवर्ष नागपंचमी से अगले दिन गाली-उत्सव आयोजित होता है| इस दिन दोनों गाँवों की औरतें आमने-सामने बैठकर एक दूसरे को जीभर गालियां सुनाती हैं।

गाली और आत्मतत्व के बीच अद्भुत समानता होती है| दोनों ही स्वत: उद्भूत होते हैं| दोनों के विकास के लिए किसी अन्य तत्व की आवश्यकता नहीं होती| बात का और खुलासा करने की कोशिश करता हूँ| बचपन में अमीबा नामक जीवाणु के बारे में पढ़ा था| अमीबा का जन्म अमीबा से ही होता है| वह एक से दो, दो से चार और चार से आठ होता चला जाता है| उसी प्रकार परमात्मा से आत्मा विलग होकर अस्तित्व में आती है| बिल्कुल यही बात गाली पर भी लागू है| स्वयं गाली से ही गाली का जन्म होता है| कबीरदास ने कहा तो है –

आवत  गारी  एक  है, उलटत होइ अनेक |
कह कबीर नहिं उलटिए, वही एक की एक ||

गालियों का अपना साहित्य और साहित्यकार होते हैं| लोकगीतों में चाहे वे संस्कार गीत, जातीय गीत, ऋतु गीत, आध्यात्मिक गीत या दिनचर्या गीत हों; गालियों का प्रयोग धड़ल्ले से होता है| ये गीत पूरे मनोयोग से गाये और सुने जाते हैं| झाबुआ जिले के खवासा क्षेत्र के गावों में होलिका दहन से एक महीने पहले होली को खड़ा रखने के लिए एक डंडा ज़मीन में गाड़ा जाता है| इस अवसर पर फाग गाते हुए आबालवृद्ध सभी आदिवासी आने-जाने वालों को गालियाँ सुनाते हुए नृत्य करते हैं| गालियाँ सुनने और सुनाने वाले सभी इस परम्परा का हिस्सा होते हैं| कोई इसका बुरा नहीं मानता| बाड़मेर क्षेत्र में ईलोजी को होली के देवता के रूप में पूजा जाता है| इस दौरान पारंपरिक रूप से गाली-गलौज का खूब प्रयोग किया जाता है| बनारसी बतकही और बतकही में गाली विश्व-प्रसिद्द है| बहाँ की संस्कृति और परम्परा से गाली को अलग किया हे नहीं जा सकता| होली के अवसर पर तो बनारसी गलियों का रूप ही बदल जाता है| अबीर-गुलाल के साथ गालियों के पाखी पंख फड़फड़ाते हुए चहुँदिस विहार करते दिखाई देते हैं|

होस्टलों में नियमित रूप से गाली देने की प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है| कहा जाता है कि इस प्रतियोगिता में सभी दर्जों के छात्र भाग लेते हैं| ये प्रतियोगिताएँ भाई-चारा बढ़ाने में अभूतपूर्व योगदान देती है| प्रतिभागियों की हार या जीत का मानदंड तय समय में दी गईं गलियों की संख्या को निर्धारित किया जाता है| याद रहे, गालियों की गुणवत्ता पर भी निर्णायक लोग पूरा ध्यान रखते हैं| स्पष्ट है, इस अभ्यास से न केवल स्मृति तीक्ष्ण होती हैं अपितु ज़बान की लोच भी बढ़ती है|

खेल भी इस परम्परा से अछूते नहीं है| महान मुक्केबाज मोहम्मद अली तो बोक्सिग रिंग में अपशब्द कहने के लिए मशहूर थे| बीबीसी के पैट मर्फी के मुताबिक क्रिकेट में अपशब्द कहने की शुरुआत साठ के दशक के मध्य में हुई है| ग्राहम कॉर्लिंग नामक एक गेंदबाज की पत्नी का दूसरी टीम के एक बल्लेबाज से प्रेम था| जैसे ही वह बल्लेबाजी करने आता, क्षेत्ररक्षण करने वाली टीम के खिलाड़ी पर्सी स्लेज का पुराना गाना ‘व्हेन ए मैन लव्स ए वुमैन’ गाने लगते थे| आस्ट्रेलिया में हरभजन सिंह और एंड्रू साइमंड्स वाला किस्सा सभी को याद होगा| एक आईपीएल मैच के बाद अम्बाती रायडू ने हर्शल पटेल नामक खिलाड़ी को गाली दे दी थी| फ्लिंटोफ के गाली देने से उत्तेजित युवराज ने छह छक्के लगाकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी| इस प्रकार हम कह सकते हैं कि गाली समय आने पर उत्पादक भी सिद्ध होती है| वैसे, आधिकारिक तौर पर बास्केटबाल में होने अपशब्दों को ट्रैश टाक, क्रिकेट में स्लेजिंग, आइस हॉकी में चर्पिंग कहा जाता है|

गालियों की रीति, प्रवृत्ति, मनोविज्ञान और भाषाविज्ञान पर लगातार शोध भी होते रहे हैं| कुछ दशक पूर्व दो रूसी भाषाशास्त्री भारत आये थे| उन्होंने विस्तृत रूप से इस विषय में अध्ययन किया था| उनके अध्ययन का निष्कर्ष यह था कि गालियों के मामले में पंजाब सबसे अधिक बढ़ा-चढ़ा प्रदेश है| इस प्रदेश में गालियों के विरासत वास्तव में चमत्कारिक है| उड़ीसा के गोपालचंद्र प्रहराज ने तो गली-गली घूम कर महिलाओं के बीच होने वाली कहन-सुनन को दर्ज किया और उनके बीच होने वाली गाली-गुफ्तार को बाकायदा संकलित भी किया|

गुलेरी जी ने लिखा –

“एक गांव में बारात जीमने बैठी| उस समय स्त्रियाँ समधियों को गालियाँ गाती हैं, पर गालियाँ न गाई जाती देख नागरिक सुधारक बाराती को बड़ा हर्ष हुआ| वह ग्राम के एक वृद्ध से कह बैठा - 'बड़ी खुशी की बात है कि आपके यहाँ इतनी तरक्की हो गई है| 'बुड्डा बोला- 'हाँ साहब, तरक्की हो रही है| पहले गलियों में कहा जाता था ... फलाने की फलानी के साथ और अमुक की अमुक के साथ। लोग-लुगाई सुनते थे| हँस देते थे| अब घर-घर में वे ही बातें सच्ची हो रही हैं| अब गालियां गाई जाती हैं तो चोरों की दाढ़ी में तिनके निकलते हैं| तभी तो आंदोलन होते हैं कि गालियां बंद करो, क्योंकि वे चुभती हैं|”

आधुनिक काल में गाली देना गलत माना जाने लगा है, पर यह उतना गलत है नहीं| आदमी सुबह से शाम तक ढोर-डंगरों की तरह काम में लगा रहता है| दूसरों का कहा करता रहता है| दूसरों का कहा सोचता रहता है| उसकी अपनी अभिव्यक्ति कहीं दब कर रह जाती है| अभिव्यक्ति को निकास मिल जाए तो मन हल्का हो जाता है| आत्मा को चैन मिल जाता है|

नीरज ने कहा –

मेरे होठों पे दुआ उसकी जुबां पे गाली,
जिसके भीतर जो था वही बाहर निकला |

ध्यान रहे भीतर कुछ भी पहले से नहीं होता| जो भी होता है, वह होता है जो भरा जाता है| कुंठाएँ, तकलीफें, संत्रास और यातनाएँ भीतर भरकर दुआओं की मांग करने वाले संसार के सभी चतुर सुजान यह अच्छी तरह समझ लें कि ‘बाहर’ को तो नियंत्रित किया जा सकता है, ‘भीतर’ को नहीं|

(इस लेख में विविध स्रोतों से प्राप्त जानकारी का प्रयोग हुआ है| सभी लेखक-महानुभावों, समाचार-पत्रों, पुस्तक प्रकाशकों का मैं ह्रदय से आभारी हूँ जिनकी कृपा और उद्योग के फलस्वरूप गाली जैसे समीचीन विषय पर पाठकों के सम्मुख उपयोगी जानकारियाँ प्रस्तुत हो पायीं|)

No comments:

Post a Comment