अपनी बात

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Monday, September 14, 2015

स सुखी नर:

मनुष्य अपने छोटे से जीवन का एक-एक पल सुख की खोज में बिता देता है| पहली साँस से लेकर अंतिम साँस तक इसी चक्कर में चकरघिन्नी बना मानसिक और भौतिक भुवन नापता रहता है| अधिकतर मामलों में तो उसे यह भी नहीं पता होता कि जिस सुख की खोज में वह ज़मीन आसमान एक किए हुए है, आखिर वह सुख होता कैसा है| विद्वान और जीवनतत्व के ज्ञाता महापुरुष भले ही जानते हों, किन्तु सच कहूँ, तो मैं स्वयं अभी तक नहीं समझ पाया कि सुख चीज़ क्या है| मुझे हमेशा यही लगता है कि सुख एक बहुत ही सापेक्षिक अनुभूति है| जो एक के लिए सुख है, दूसरे के लिए घोर दुःख हो जाता है| जो किसी व्यक्ति के लिए एक समय या एक स्थान पर सुख है, उसी व्यक्ति के लिए वही दूसरे स्थान या दूसरे समय दुःख हो जाता है| तो, सुख स्थान-सापेक्ष, समय-सापेक्ष और व्यक्ति-सापेक्ष होता है|

सुख की खोज में मानुष भटकता रहता है| कुछ अच्छे में सुख देखते हैं और कुछ बुरे में| वैसे तो अच्छा और बुरा भी बहुत सापेक्षिक निर्णय है| किसी के लिए जो अच्छा होता है, किसी दूसरे के लिए वही बुरा हो जाता है| इस विषय पर फिर किसी समय विस्तार से चर्चा करेंगे| फिलहाल, बात को आगे बढ़ाने के लिए मान लेते हैं कि कुछ अच्छा होता है और कुछ बुरा| अच्छा या बुरा संस्कार, मान्यता, परम्परा, दुनिया की अनावृत्ति, मन:स्थिति, अपने परिजन का रुझान जैसे असंख्य कारकों और घटकों पर आधारित होता है|

संत अनाम ने दुःख से संतप्त व्यक्ति को एक कागज की पुड़िया देकर कहा कि घर जाकर ही इसे खोलना और इसमें लिखे नुस्खे का सेवन करना, प्रसन्नता प्राप्त हो जाएगी| कुछ समय पश्चात् जब वह व्यक्ति पुन: उनसे मिलने आया तो काफी प्रफुल्लित दिख रहा था| उस पुड़िया में लिखा नुस्खा जिसका उसने सेवन किया था और प्रसन्नता पाई थी, कुछ इस प्रकार था – “मन में विवेक और संतोष होने से ही स्थायी सुख, शांति और प्रसन्नता मिलती है|”

कुछ लोग सुख के अन्वेषण में सारा जीवन इन्द्रियों की गुलामी करते हुए ही बिता देते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि उससे ही सुख प्राप्त होगा| ऐसे नासमझ लोगों से कोई पूछे कि गुलामी में आजतक किसे सुख मिला है! हमारे एक परिचित हर रविवार को नियमित रूप से हरिद्वार की यात्रा पर जाते हैं| ध्यान रहे उनकी यह यात्रा गंगा-दर्शन करके पुण्य कमाने के लिए नहीं होती| वे तो मथुरा कचौड़ी वाले के यहाँ अपनी जिह्वा को प्रसन्न करने के लिए जाते हैं| उनका पूरा ध्यान इस बात पर होता है कि वे कुछ भी करके पहले घान की कचौड़ी पाने में सफल हो जाएँ| सप्ताह के बाकी छह दिन वे चिकित्सकों से परामर्श के लिए समयादेश लेने में निकाल देते हैं| हंत! इन्द्रियजन्य सुख का परिपाक भी सुख में नहीं हुआ|
हमारे एक और मित्र बड़े गर्व से बताते हैं कि उनके पास इत्रों का कितना बड़ा संग्रह है| शाम के समय कुर्ता-पैजामा पहन कर और कानों में इत्र की फुहियाँ लगा कर जब वे निकलते हैं, तो उनकी अदा ही निराली होती है| वे कहते हैं कि उन्हें इसमें सुख मिलता है लेकिन मुझे तो कभी भी उनके चेहरे पर सुख चमकता दिखाई दिया नहीं| हाँ, इतना अवश्य है कि उनके मुखारविंद पर अभिमान और विशिष्टता की छायाएँ बारी बारी से आती जाती रहती हैं|

कुछ कुत्सित रूचि के लोग दूसरे का काम बिगड़ना, ईर्ष्या, दूसरे का अपमान-पतन जैसे कारकों के माध्यम से सुख प्राप्त करते हैं| ऐसे लोग अपने प्रकर्ष से प्रसन्न नहीं होते बल्कि दूसरे का अपकर्ष उन्हें आनंद देता है| उनका सारा जीवन षड्यंत्र रचाने और उनके कार्यान्वयन में ही बीत जाता है| दूसरों के काम में भांजी मारना उन्हें पसंद होता है| दूसरे का काम सही हो जाए तो उनकी छाती पर सांप लोटने लगते हैं| अब इसमें कितना सच्चा सुख उन्हें मिलता है, ये तो वे ही जाने|

लोग अधिकार, सम्मान, शक्ति आदि अलग अलग स्थलों में सुख पाने के कोशिश करते हैं| अफसर दफ्तर में बैठकर अपने अधीनस्थ कर्मचारियों पर रोब गांठते हैं|  नीचे दर्जे के कर्मचारी अपने पास काम से आने वालों को तिगनी का नाच नचाते हैं| न इधर सुख और न ही उधार सुख| शायद उनके अभिमान के पादप को थोड़ा बहुत खाद-पानी मिल जाता होगा किन्तु उससे सुख कहाँ मिलता है! अभिमानियों के सिरमौर रावण और दुर्योधन को भी सुख नहीं मिला, तब औरों की तो बात ही क्या है|
सम्मान-सुख पाने के लिए भी लोग तरह तरह के कारनामे करते रहते हैं| कालेज के दिनों में सम्पन्न परिवार में जन्मा हमारा एक साथी अपने साथ बहुत से सहपाठियों को सिनेमा दिखाने ले जाया करता था| सभी का टिकट वह स्वयं खरीदता था| मध्यावकाश में सबके खाने-पीने की व्यवस्था भी वह स्वयं ही करता था| इसके बदले में संगी साथियों को उसके थियेटर में पहुँचने से पहले सीट पर बैठ जाना होता था और उसके सिनेमा हाल में प्रवेश करने पर स्वागत में खड़े होना होता था| इसका परिणाम यह होता था कि और भी बहुत से लोग हठात् खड़े हो जाते थे| उन्हें लगता था कि किसी विशिष्ट व्यक्ति का आगमन हुआ है|
पटाचारा ने अपनी पसंद के युवक से विवाह किया| परिणाम स्वरूप माता-पिता ने अपनी बेटी से संबंधविच्छेद कर लिया| समय बीता| उसके दो पुत्र हुए| एक दिन माता-पिता की याद आयी तो पति और बच्चों को लेकर उनसे मिलने चल पड़ी| मार्ग में सर्प के काटने से बड़े पुत्र की मृत्यु हो गयी और छोटे को एक वन्य जीव ने मार दिया| पति भी जलधारा में बह गया| घर पहुँचने पर पता चला कि इतने दुःख भोगकर जिन माता-पिता से मिलने का सुख पाने आयी थी, वे चल बसे हैं| इसी दौरान उसकी भेंट बुद्ध से हुई| उनके सामने अपनी करुण कथा कह सुनाई| बुद्ध ने उपदेश दिया कि यह संसार नाशशील है, कष्टों और विपत्तियों से भरा है| जीवन-संघर्ष ही जीवन का सार-तत्व है| पटाचारा सांसारिक सुख का लोभ त्याग कर शाश्वत सुख पाने के लिए वह बौद्ध भिक्षुणी हो गई|
गीता में सुख के प्रश्न का बहुत सुन्दर उत्तर मिलता है –
शक्नोतीहैव य: सोढुम् प्राक्शरीरविमोक्षणात्| कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्त: स सुखी नर:|| ५/२३
जो साधक इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है| सुख की प्राप्ति के लिए योगी होना पड़ता है| उसके लिए काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, ईर्ष्या, द्वेष जैसे इन्द्रियजन्य विकारों से ऊपर उठना पड़ता है| आत्मोत्थान के प्रति सजग होना पड़ता है| तब कहीं जाकर सुख की प्राप्ति होती है|
एक वाक्य में कहूँ तो भौतिक जीवन में जिन्हें सुख का साधन माना जाता है उन्हें छोड़ना ही सुख है|

 

1 comment:

  1. इस नवसाम्राज्यवादी और उपभोगातावादी समाज में जहां बाज़ार ही प्रमुख है और हम बिना सोचे - समझे भौतिक वस्तुओं में अपना सुख ढूँढते है और कुछ लोग चाहते भी हैं हम कुछ न सोचे , न कुछ चिंतन करें सिर्फ वे बाज़ार में जो परोस रहे हैं उन्हें भीड़ की तरह खरीदने में सुख ढूँढते रहे, ऐसे में आपका ये लेख प्रशंसनीय है |
    'भौतिक जीवन में जिन्हें सुख का साधन माना जाता है उन्हें छोड़ना ही सुख है|'

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