अपनी बात

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Thursday, September 3, 2015

गमले में लगे पौधे

गमले में लगे पौधे हमेशा से ही न जाने क्यों मेरे मन में करुणा का भाव जागृत कर देते हैं| उनकी प्रतिबंधित फैलावट विवशता का जीता जगता चित्र सामने प्रस्तुत कर देती है| जड़ों को फैलाने की स्वतंत्रता उसके पास नहीं होती| उसका पोषण दूसरों की याद, सावधानी और चित्तवृत्ति पर आधारित हो जाता है| जड़ें मनचाहा रस धरती से ले नहीं सकती| उन्हें वही मिलता है, जो उन्हें दिया जाता है| उन्हें उसी पर जीवित रहना होता है, जो दूसरे उनके लिए सही समझते हैं| यह करुण-भाव और भी अधिक सघन हो जाता है, जब किसी स्वत: उग आये वृक्ष को आत्मगौरव से मस्तक ऊँचा किये, मस्त-मगन हवा की ताल पर झूमते हुए देखता हूँ|
जड़ें नहीं फैलती तो तना, डालियाँ और पत्ते ही अपने पूरे यौवन को कहाँ पा सकते हैं! गमले में जमे नुमाइशी पौधे मात्र अपने मालिक की रुचियों का नमूना हो कर रह जाते हैं| उनमें स्वत्व का नितांत अभाव रहता है| अपनी कोई पहचान नहीं, इच्छा नहीं, रूप नहीं|
ऐसा नहीं कि ये नुमाइशी पौधे केवल गमलों में ही उगते हैं| अंकल को नमस्ते करो, कविता सुनाओ, गाना सुनाओ, तबला बजाकर दिखाओ, सीधे बैठो, ज़्यादा बात मत करो, योगा क्लास में सीखे हुए आसन करके दिखाओ, कक्षा में ध्यान दो जैसे वाक्य अक्सर जता देते हैं कि परिवारों में भी नुमाइशी पौधे पनपाये जाते हैं| पंख बाँध कर पंछी से सूरज तक पहुँचने की उम्मीद रखने वाले हर जगह डेरा जमाए हैं|
समाज के हर स्तर पर यह मनोवृत्ति दिखाई देती है| लोग दूसरों में निवेश करते हैं और फिर निवेश का प्रतिदान चाहते हैं| वह प्रतिफल होता है पहचान का, शक्ति का और नियंत्रण का| जीते जागते लोग उत्पाद में बदल दिए जाते हैं| हम भावनाओं का व्यापार करने में निपुण हो गए हैं| संस्थाएँ, दफ्तर, विद्यालय-महाविद्यालय-विश्वविद्यालय, व्यापारिक प्रतिष्ठान, राजनीति, प्रशासन सभी जगह असबाब के साथ साथ मानवों और मानवीय भावनाओं की तिजारत चलती है| अंतर केवल इतना है कि कहीं हम खरीददार बनकर जाते हैं, तो कहीं ताजिर बनकर| कभी हम गमले में पौधा पालने वाले होते हैं, तो कभी साक्षात् गमले में पलता पौधा|
यह स्थिति संसद में बैठी कठपुतलियों पर भी लागू होती है| आलाकमान ने जो हुक्म जारी कर दिया, वह पत्थर की लकीर हो गया| उससे इंच भर भी डिगा नहीं जा सकता| आत्मा की आवाज और उसके भीतर उठती कराह दबा दी जाती है| दिल किसे सही मानता है, इससे सोच पर कोई फर्क नहीं पड़ता| जो बता दिया गया उसे ही रट्टू तोते की तरह उच्चारते रहना है| ऐसा आचरण मजबूरी है, उनमें निवेश जो किया जाता है| पार्टी नाम के गमले में रोपा जाता है, पनपाया जाता है और स्वतन्त्र चिंतन का माद्दा बढ़ाने वाला रस देने वाली मूल जड़ को काट दिया जाता है| और, हम बावले उन्हें अपना और अपने देश का भाग्य-विधाता मानते हैं|
उच्च अधिकारी अपने से छोटे अधिकारियों को प्रश्रय देते हैं| यह परम्परा नीचे तक चली जाती है| उद्देश्य अपने प्रभाव को बनाए रखना ही होता है| नीचे वाले काबू में रहेंगे तो पूरी व्यवस्था काबू में रहेगी| अनंकुश मातहत कमजोरी की निशानी है| अधिकार के गढ़ में सेंध है| कब्ज़ा बना रहना चाहिए, बाकी जाए भाड़ में|
गमलों में पौधे उगाना बड़े लोगों की मजबूरी होती है| उन्हें भी अपने रसूख को बनाए रखने के लिए ऐसा करना पड़ता है| उनकी शक्ति और प्रतिष्ठा के चिह्न स्वतंत्रता की भाषा बोले नहीं कि उनका अपना प्रभा-प्रासाद धरर धर्राट करके गिर जाता है| आडम्बर को बनाए रखने के लिए जो बलियाँ दी जाती हैं, सभ्यता के शब्दकोश में उन्हें गमले के पौधे ही कहा जाता है|
 

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