अपनी बात

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Monday, August 31, 2015

उसकी परवाह ही किसे है?

कल शाम काम से लौट रहा था| फ़ौरन घर पहुँचने की कोई ऐसी ख़ास वजह थी नहीं, इसलिए आराम से टहलता हुआ चला जा रहा था; कुछ दो चार जान पहचान वालों को नमस्कार करता हुआ और दो चार जान पहचान वालों की नमस्कार लेता हुआ| छोटे शहरों में वैसे भी किसी को किसी काम की हड़बड़ी तो होती नहीं है| लोग त्वरा करते हैं तो सिर्फ इसलिए कि दूसरे लोग जान लें यहाँ ठलवे नहीं बैठे हैं, काम की जल्दी में है| शहर के बाहरी हिस्से में बना अक्सर शांत रहने वाला रास्ता था| कोई घटना ही घट जाए तो बात अलग है, वरना यहाँ जीवन और गति में छत्तीस का ही आंकड़ा रहता है|

थोड़ी दूर पर सड़क के किनारे पर भीड़ भाड़ दिखाई दी| मार डाला, मार डाला का चीत्कार हो रहा था| दूर से कुछ झगड़े का सा दृश्य लग रहा था| पास पहुंचकर पूछ-ताछ की तो पता चला कि किसी ट्रक ने साइकिल को टक्कर मार दी थी| मजदूर जैसा दिखने वाला साइकिल सवार घायल होकर सड़क के किनारे पड़ा हुआ था| कुछ लोग इस घटना से नाराज होकर ट्रक के ड्राइवर को पीट रहे थे| ड्राइवर का सहायक एक तरफ उत्तेजित सा खड़ा किसी से फोन पर बात कर रहा था| शायद, ट्रक के मालिक के लिए घटना की लाइव रिपोर्टिंग करने में लगा था| अपने हाव-भाव से यह भी जताने की पूरी कोशिश कर रहा था कि उसकी सहानुभूति जनता के साथ है| थप्पड़ – घूँसो के लगने की चटाक-धमक और ड्राइवर के चिल्ला-चिल्ला कर दुहाई देने की आवाज निरंतर आ रही थी| न्याय और दंड की सम्पूर्ण व्यवस्था भीड़ के हाथों में थी|

मैं सड़क के किनारे पर खड़ा, मामले को समझने की कोशिश ही कर रहा था कि एक व्यक्ति तेजी से स्कूटर पर वहाँ पहुँचा| ब्रेक लगाकर स्कूटर को स्थिर किया| स्कूटर को स्टैंड पर चढ़ाकर, क्षण भर खड़े होकर हलचल का जायजा लिया| फिर झपटकर, “ठहरो, ठहरो” पुकारकर, भीड़ को चीरता हुआ हलचल के केंद्र में पहुँच गया| मुझे लगा कि वह ट्रक का मालिक था जो ड्राइवर की रक्षा के लिए इतनी तत्परता और बहादुरी के साथ भीड़ में समा गया था|

पर, यहाँ तो बात कुछ और ही निकली| उसने पहले अपनी दोनों बाजुओं के जोर से पीटने वालों को परे हटाया| फिर, चार छह हाथ अपराधी को जमा कर, झटका लगने से खुल चुकी अपनी घड़ी की चेन को संतुष्टि के साथ बंद करता हुआ धीरे धीरे चलकर बाहर निकल आया| स्कूटर के पास पहुँच कर डलिया में रखी हुई बोतल निकाली और पानी की घूँट भरते हुए हुए मुझसे मुखातिब हुआ, “क्यों भाई साहब, चक्कर क्या है? किस खुशी में इस हरामखोर की सुँताई चल रही है?” फिर अपने आप ही अनुमान लगाते हुए बोला, “ठोका होगा साले ने किसी को|”

मैं बताना चाहता था कि किसी को नहीं बल्कि एक गरीब आदमी को इसने टक्कर मारी है लेकिन लगता है, वह थोड़ा जल्दी में था| मेरे जवाब की प्रतीक्षा किये बिना उसने चाबी स्कूटर में लगाई| झटके से किक मारकर स्कूटर चालू किया और टरटराहट की आवाज पैदा करते स्कूटर पर सवार होकर जितनी तेज़ी से आया था उससे भी अधिक तेज़ी से निकल गया| जब तक मैं बोलना शुरू करता, तब तक तो आगे की गली में मुड़कर मेरी निगाहों से ओझल हो चुका था|

घायल साइकिल सवार एक ओर पड़ा हुआ था| भीड़ अभी भी ट्रक ड्राइवर को पीट रही थी| पसीने, खून और लार से लथपथ ड्राइवर निढाल होकर जमीन पर गिर गया था| अब वह मार से बचने की कोशिश नहीं कर रहा था| वह पीड़ा के आवेग की उस सीमा तक पहुँच गया था कि जहाँ स्वयं को पीड़ा से बचाने का प्रयत्न भी निरर्थक लगने लगता है| दर्द बहुत बढ़ जाए तो महसूस होना ही बंद हो जाता है|

इसी बीच, दो सिपाही भी घटना स्थल पर पहुँच गए| उन्होंने आते ही जमीन पर डंडा फटकार कर अपने वर्चस्व की उद्घोषणा की| भीड़ तितर बितर होने लगी| इनके मुँह कौन लगे, लोग अपनी राह लगने लगे| सिपाहियों ने जमीन पर गतिहीन पड़े ड्राइवर को कालर पकड़ कर उठाया और घसीट कर थाने की तरफ ले जाने लगे| थोड़ी दूर तक कुछ उत्साही लोग झुण्ड बनाकर आगे पीछे चले फिर एक एक कर अपने रास्ते हो लिए|

एकांत होते ही घिसटता हुआ ड्राइवर अपने पैरों पर खड़ा हो गया| उसने हाथ जोड़कर फुसफुसाते हुए सिपाहियों से कुछ कहना शुरू किया| उसकी बात पूरी होने से पहले ही एक सिपाही ने उचक कर ड्राइवर के गाल पर एक तमाचा रसीद कर दिया| ओस चाटे प्यास नहीं बुझती| इस बार चोट का असर नहीं हुआ, वह जानता था कि हर मर्ज की दवा क्या होती हैं| उसका हाथ सीधे अपनी जेब में गया| उसने जेब से कुछ निकाल कर सिपाही की हथेलियों के बीच सरका दिया| इसी बीच ट्रक का क्लीनर ट्रक को चालू करके उस स्थान पर ले आया था, जहाँ अपराधी और क़ानून के रक्षक आपस में गंठजोड़ कर रहे थे|

ड्राइवर लंगड़ाता हुआ मंथर गति से ट्रक की ओर चला और ड्राइवर सीट के बाजू वाली सीट पर बैठ गया| ट्रक के घरघराने की आवाज फिर सुनाई दी और वह आगे बढ़ गया|
 
सिपाही सड़क के किनारे खड़े ठेले पर पहुंचे और मुफ्त के चने टूंगने लगे| सब शांत हो गया| यातायात निर्बाध गति से चलने लगा|
 
उधर घायल साइकिल सवार धीरे-धीरे उठा| उसने आपने थैले से चारों ओर बिखर गए आलुओं को इकट्ठा किया| सड़क के किनारे लगे म्युनिसिपलटी के नल से बहते पानी में अपना घुटने का घाव धोया| फटे हुए पैजामे पर हसरत भरी निगाह डाली| साइकिल का हैंडिल ठीक किया| टेढ़े हो गए पहिये को सीधा करने की असफल कोशिश की| और फिर, अपने नुक्सान का अंदाजा लगाता हुआ साइकिल को घसीटता एक ओर को चल दिया| उसकी किसी को परवाह नहीं थी|
 

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