अपनी बात

"ब्लॉग, जो विधाओं की सीमा से परे होकर अभिव्यक्ति की बात करता है, जो विचार की बात करता है चाहे वह कहानी, हास्य, व्यंग्य, कविता, समीक्षा, लेख, डायरी, भाषण, निबंध जैसे किसी भी रूप में हो; जहाँ भावना की प्रधानता भाषा से किसी भी रूप में न्यून नहीं है; जिसके विषय में घर, परिवार से लेकर फिल्म, नाटक, साहित्य, समाज, खेल, राजनीति, अर्थशास्त्र, कला आदि सभी आ जाते हैं|"

Friday, August 28, 2015

कोई दार्शनिक अर्थ नहीं, प्लीज़ !

आज सूचना मिल गयी है| घर बदलना है| दो – तीन दिन के अन्दर ही अन्दर बदलना है| एक घर को छोड़ कर दूसरे घर में जाना है| पुराने घर में कभी लौटना भी नहीं होगा| अजीब सा लग रहा है| बुरा लग रहा है|

जो घर छोड़ कर जाना है उसमें कुल सामग्री ईंट की दीवारें, लकड़ी - टीन के किवाड़, प्लास्टिक - लोहे के पाइप और कुछ बिजली की तारें है| और भी दो - चार छोटी - मोटी बेजान सी चीज़ें हैं, जो घर के अन्दर या बाहर उसका हिस्सा हैं| ये सब बेजान हैं, लेकन बेज़ुबान नहीं| बार - बार कुछ उलझे से सवाल पूछती महसूस होती हैं - आना क्यों होता है? आना होता है तो जाना भी क्यों होता है? आने के पहले और जाने के बाद का समय वैसा क्यों नहीं होता जैसा आने और जाने के बीच का समय होता है? सवालों के जवाब नहीं जानता, इसलिए चुप हो जाता हूँ| खामोशी के साथ सामान बांधने में लग जाता हूँ|

मज़े की बात तो यह है कि जो घर इतना मुखर होकर मेरे साथ सवाल – जवाब कर रहा है, कुछ साल पहले तक मुझसे बिल्कुल अनजान था| हमारी आपस में कुशल क्षेम तक पूछने की पहचान नहीं थी| मुझे याद है जब मैं पहली बार इसी घर में रहने वाले अपने एक परिचित से मिलने आया तो इसने मेरे आने पर ध्यान भी नहीं दिया था| लान में लगी घास पर चल कर मैं इस घर के अन्दर आया था, और जब लौटा तो उस पर मेरे आने का कोई निशान भी नहीं बचा था| बाहर लगे पेड़ पौधे भी लगातार दूसरी ओर देखते रहे थे, बेखबर से|

फिर कुछ समय बाद मैं खुद यहाँ रहने आ गया| शुरू में तो हम आपस में कुछ अजनबी से रहे| एक दूसरे से झेंपते से रहते थे| अपने राज़ एक दूसरे के साथ नहीं बाँटते थे, बल्कि यूँ कहें; आपस में बात तक नहीं करते थे| मैं अपने पुराने घर को याद करता था और वह अपने पुराने निवासी को| हम एक दूसरे का नाम तक भूल जाते थे| शाम को काम से लौटता तो पैर अपने आप पुराने घर की ओर चल पड़ते| फिर याद आता कि कहाँ जाना है| घर पहुँचता तो माहौल सूना – सूना और अवांछनीय ज्ञात होता, अनचीन्हा सा| लगता कि घर है ही नहीं, कहीं बाहर गया हुआ है| मुझे लगने लगा कि हम एक दूसरे को पसंद तक नहीं करते|

घर में आने के बाद पहली बारिश में ही छत टपकने लगी, बेहद तकलीफ हुई| समय काटना कठिन हो गया| बीमार की रात पहाड़ बराबर| पानी पी-पी कर उस घड़ी को कोसा जब इस घर में आने का निर्णय लिया था| घर चुप रहा| उसने कोई प्रतिवाद नहीं किया| उसकी चुप्पी न जाने क्यों मुझे भीतर तक छू गई| मुझे लगा कि शायद मैं उसके प्रति ज्यादती कर रहा हूँ| न चाहते हुए भी मैंने अपने को समझाया कि इसमें घर की कोई खता नहीं है| वह तो बेचारा धूप और बारिश से बचाने की भरसक कोशिश ही कर सकता था, जो वह कर रहा था| जब दूसरी बारिश हुई तो मकान बनाने वालों पर खीझ निकाली|

फिर, धीरे - धीरे परिचय गहराने लगा| उसे मेरी आदतें याद रहने लगीं और मुझे उसका पता मालूम होने लगा| कभी कभी घर की दीवार के सहारे खड़ा होकर पूरा अखबार पढ़ जाता तो दीवार पर पसीने के निशान रह जाते| एक दूसरे की देह-गंध अब अच्छी लगने लगी थी| मेरे नाम की चिट्ठियाँ भी यहाँ पहुँचने लगीं थी| आस पड़ौस के लोग मुझसे बात करते हुए घर को ‘आपका घर’ कहकर पुकारने करने लगे थे| कलेंडर बदलते रहे| अंत में ऐसा भी समय आ गया कि सारा दिन पाँव घसीटते हुए चलते रहने के बाद, घर लौटते समय पाँवो में पंख लगने लगे| रिश्ता बन कर, मजबूत भी होने लगा था|

अचानक एक दिन घर को पाँव लग गए| छोटे - छोटे पैरों में पैंजनिया बाँध कर रुनक - झुनक करता घर महकने लगा| दिन – रात आवाजों से भरा रहने लगा, कभी किलकने की तो कभी हिलकने की, कभी रूठने की तो कभी मनाने की, कभी रोने की तो कभी खिलखिला कर हंसने की| घर ज़िंदगी का हिस्सा बन गया था, ज़िंदगी बन गया था|

घर की खिड़कियों पर परदे लटक गए| दीवारों पर सजावटी तस्वीरें जड़ दी गयीं| कोनों में गुलदान सज गए| सुबह-शाम खाने की गंध घर में फैलने लगी| मेज़पोश बिछे दिखाई देने लगे| फूलदार चादरों के रंग बिखरने लगे| मनी-प्लांट का नन्हां सा पौधा आले में सज गया| बड़ी दुनिया के ठीक बीचो - बीच एक छोटी सी दुनिया मुकम्मल तौर पर काबिज हो गयी|

घर मेरे लिए एक पिन-बोर्ड की तरह हो गया था, जिसके कोने कोने में तरह तरह की तस्वीरें लगती जा रहीं थीं| बड़ा अनोखा पिन-बोर्ड था यह| बहुत जल्दी भर जाता था, पर फिर भी नयी तस्वीर के लिए उसमें न जाने कहाँ से जगह निकल आती थी|

अब घर बदलना है| नए घर में जाना है| इस घर की दीवारें न जाने कितने दिन मुझे याद करेंगी| इस घर का दरवाज़ा न जाने कितने दिन याद आयेगा| नया घर न जाने कितने दिन अपने पुराने निवासी को याद करेगा| नया घर न जाने कितने दिन अपरिचित सा लगेगा|

घर तो बदलना ही है|

 

2 comments:

  1. घर तो बदलना ही है|- ह्रदय विदारक वर्णन - ऐसा प्रतीत होता है कि घर यहाँ प्रतीक है | समय के प्रवाह में अनेक सम्बन्ध छूट जाते हैं | मुझे आनंद फ़िल्म की ये पंक्तियाँ याद आ गईं "बाबू मोशाय, हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां है, जिसकी डोर ऊपर वाले के हाथ में है----------

    ReplyDelete
  2. आपने बिलकुल ठीक पकड़ा, मिश्र जी| घर एक प्रतीक ही है| उसे आप शरीर चाहें तो शरीर के रूप में, सम्बन्ध चाहें तो सम्बन्ध के रूप में ले सकते हैं| आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद|

    ReplyDelete