अपनी बात

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Wednesday, August 26, 2015

उस ज़माने की बात मत कर

वो ज़माना भी क्या कमाल का ज़माना था जब हम अपने को प्रेम का देवता मानने लगे थे!

वो ऐसा दौर था जब हमारी रगों में प्रेम बहता है, दिल में प्रेम धड़कता है, सांस के साथ प्रेम ही फेफड़ों में आता - जाता है| ये वो वक्त था जब नींद में प्रेम के स्वप्न आते थे, जागते में प्रेम आँखों में समाया रहता था और ऊंघते में खर्राटे भी प्रेम के ही आते थे| गौर कीजिए, ये बात में मज़ाक में नहीं कह रहा हूँ| मेरे इस बयान में छिपी संजीदगी को पूरी तरह सम्मान दिया जाए, ऐसी मेरी प्रार्थना है|
 
ये बातें तब की हैं जब बचपन की गलियों में की जाने वाली मासूमियत भरी अठखेलियाँ अपने आखरी मुकाम पर पहुँच चुकी थी| जवानी के महल में भी पूरी तरह दाखिला मिला नहीं था| बस यूँ समझिए कि दरख्वास्त लगा रखी थी और अपनी बारी की इंतज़ार में थे| बीतते समय से पीछा छुड़ाने की फ़िराक़ में थे और, आने वाले लम्हों के बारे में सोच सोच कर मन में हो रही गुदगुदी का पूरा मज़ा लेने की तैयारी में थे| इस बात की तसल्ली थी कि जो गोरी गुदगुदी उंगलियाँ हमारे फूले - फूले गालों को यूँ ही खींच कर लाल कर दिया करती थीं, अब उनकी छुअन में अनुराग महसूस करने के लिए हम ‘क्वालीफाई’ कर जायेंगें| या, कुछ ऐसे कहें कि गालों की लाली का कारण बदल जाएगा|
 
‘ट्रांस्फोर्मेशन’ के उस मौसम में प्रेम एक धर्म की तरह महसूस होने लगा था| उस धर्म का दर्शन और कर्मकांड दोनों मिल-कर दिलो-दिमाग में फागुनी बयार बहाए दे रहे थे| लगने लगा था कि हमारा जन्म ही प्रेम को प्रतिष्ठित करने के लिए हुआ है| हम ईश्वर के शुक्रगुजार थे कि उसने इस महत् कार्य के लिए हमें चुना था| हम ने अपना तन, मन और धन (जो भी थोड़ा सा जेबखर्च के तौर पर मिलता) इसी उद्देश्य पर वारने की पूरी तैयारी कर रखी थी|
 
सच्चे मिशनरी की तरह हमने बहुत से उत्तरदायित्त्व खुद-ब-खुद अपने सर ले लिए थे| ज़ाहिर है, ‘सुन्दरता की रक्षा’ की ज़िम्मेदारी भी हमारे ही कन्धों पर आन पड़नी थी| इस मक़सद को पूरा करने के लिए हमने अपने वास्ते कुछ काम भी तय कर लिए थे जैसे – सुन्दरता की पहचान करने के लिए सारे शहर को साइकिल पर बैठ कर नापें, ज़माने की बद-नज़रों से बचाने के लिए शहर के नहीं तो कम से कम मौहल्ले के सौन्दर्य के आस-पास रहने की कोशिश करें और रात-बे-रात खूबसूरती को क़ैद रखने वाले किलों की चहारदीवारियों के कमजोर जोड़ों की जांच करें| हाँ, एक और ज़रूरी बात हमारी समझ में आ गयी थी और वह थी लगातार लेख, सन्देश और पत्र लिखने का महत्त्व| उसके लिए हमने अभ्यास शुरू कर दिया था| कवियों, शायरों और लेखकों के प्रेम-साहित्य के अवगाहन को हमने अपने रोज़मर्रा के जीवन का अंग बना लिया था| डायरी बना ली थी जिसमें रोज़ की आहों और कराहों का हिसाब लिखा जाने लगा था| खून-ए-जिगर में उबाल तो नहीं आया था पर कुछ बुलबुले ज़रूर छूटने लगे थे| उन बुलबुलों का हिसाब भी डायरी में बाकायदा तौर पर रखा जाने लगा था| कहने का मतलब यह है कि लिस्ट तो काफी लम्बी हैं पर, इन कुछ मिसालों से हमारी उस समय की रणनीति का कुछ तो अंदाजा हो ही जाता है|
 
हम एक बात अच्छी तरह समझ चुके थे कि केवल प्रेम के सिद्धांत को पढ़ने से हमारा ‘प्रेम और सौन्दर्य’ की रक्षा का उद्देश्य पूरा होने वाला नहीं था| प्रेम को अमली जामा पहनाना ज़रूरी था| हम जान गए थे कि प्रेम के ‘क्रियात्मक’ और ‘व्यवहारात्मक’ रूप को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता| प्रेम का अभ्यास ज़रूरी था| खुशबू-ए-मोहब्बत की चिमगोइयां महसूस करना ज़रूरी था| बस फिर क्या था, हम भी कमर कस कर चाहत के मैदान में उतर पड़े| इस मामले में कच्ची उम्र में ही हमने वो वो रंग दिखाने शुरू किए कि लोग अश अश कर उठे| इधर मुहब्बत की खुमारी में सुबह शुरू होती और उधर उसी मुहब्बत के परवान चढ़ते नशे में डूबे इस काफिर को रात अपने कांधों पर उठाए नींद के बिछौने पर ला पटकती| एक के बाद एक प्यार के अफसाने लिखे जाने लगे| उन दिनों दिल की धड़कने तेज़ रहने लगीं थीं, आँखों में लाल लाल डोरे मुक़म्मल तौर पर बने रहते थे, सीने में अजीब सा दर्द रहने लगा था, अक्सर झूला झूलते हुए नीचे की तरफ आने पर जो अनुभूति होती है दिमाग की कुछ वैसी सी कैफियत रहने लगी थी| आँखें बंद किये बैठे रहने का मन करता रहता था| एक योग-निद्रा थी जो कुछ समय तक जारी रही|
 
हमने नैतिकता नामक चिड़िया के साथ एक ही पिंजरे में मुहब्बत को पालने वाले मठाधीशों की क़ैद से उसे मुक्त कराने के लिए भी अपने स्तर पर संघर्ष किया| हमारे ख्याल में ये ऐसा खेल था जिसमें किसी नियम को नहीं माना जा सकता था| हम अपनी पूरी शिद्दत और हिम्मत के साथ प्रेम की क्रान्ति में लगे रहे| हालात यहाँ तक पहुँच गए कि कभी कभी तो हमें कुछ ही घंटों में कई कई बार प्यार होने लगा| कभी कभी एक ही साथ कई कई से प्यार भी हो जाता था| यह न जाने किसके खिलाफ विद्रोह का हमारा अपना तरीका था|
 
उस कमसिनी में हमारी मुहब्बत जाति, धर्म, वर्ग, उम्र और रंग के बंधनों से आज़ाद थी| हमने कभी भी इस ख्याल को अपने पास नहीं आने दिया कि मुहब्बत के मामले में चुनाव की भी अहमियत हो सकती है| हमने सभी को बराबरी का मौक़ा दिया और सभी से बराबरी का मौक़ा लिया|
 
नींद कितनी भी गहरी हो टूटती ही है| सुबह कितनी भी ख़ूबसूरत हो उसका अंजाम सूरज की तपन ही होता है| वो ज़माना भी पीछे छूट गया है| यादें हैं, देखें कब तक बनी रहती हैं|
 
तब तक -
मुहब्बतों के हसीन अफ़सानों की बात मत कर
तू इस ज़माने में उस ज़माने की बात मत कर|

4 comments:

  1. वाह वाह !! दिल के तार छू लिए ------
    जाने वे कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला ------

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  2. सब हम जैसे ही थे, मिश्र जी|

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  3. Bahut badiya lekh hai ! Dil ko chune wala ! Badhai !

    Ab mohabbat hi aakhiri saaya hai doston,
    is dar se uthoge to koi dar na milega .

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  4. वाह धीरज जी, बढ़िया बात कही है|

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