अपनी बात

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Monday, August 24, 2015

किस्सा लेडी के कंगन का

इतिहास की किताबों में तो शायद इस घटना का ज़िक्र न मिले, पर है सोलहों आने सच्ची| इसी दावे के साथ हमारे एक मित्र ने यह वाक़या सुनाया था| मित्र स्वभाव से बेतकल्लुफ़ आदमी है, इसलिए उनकी भाषा का बहाव भी उतना ही बेधड़क और नि:संकोच है| विवरण को ज्यों की त्यों सुनाने की हिम्मत नहीं हो रही है| थोड़ा बहुत भाषिक फेरबदल ज़रूरी है|
 
तो जनाब, यह उस ज़माने की बात है जब अँगरेज़ हमारे देश के माई-बाप हुआ करते थे| उनके भी माई-बाप उनके हाकिम होते थे| सभी हाकिमों के माई-बाप वायसराय बहादुर होते थे और उनकी भी मालकिन वायसरीन| तो सभी को मालूम हो, केवल भारतीय पतियों के साथ ही ऐसा नहीं होता| यह रिवाज़ काफी पुराना है| ऊँचे रुतबे वाले अंग्रेजों में भी यह चलन था| हम दिलेर हैं और फितरत से थोड़े गँवई भी, इसलिए हँसते-हँसते स्वीकारोक्ति कर जाते हैं| अब अँगरेज़ ठहरा सभ्य, सुसंस्कृत और ठसके वाला प्राणी, इसलिए कहता नहीं, बस मन ही मन इस बात को मानता रहता है| खैर, लगता है कि हम किस्से से दूर जाने लगे हैं|
 
बात यूँ हुई कि एक वायसराय बहादुर थे| ज़ाहिर है, एक वायसरीन भी थीं| वायसरीन थीं तो उनके पास आभूषणों का पूरा ज़खीरा भी था| घर बड़ा, बहुत सारे नौकर-चाकर, बहुत सारा सामान, बहुत सारी सामान रखने की जगहें भी और लेडी होने की वजह से स्वभाव में बहुत सारी नजाकत भी थी| किसी भी चीज़ को संभालकर रखना उन पर ही फबता है जिनके पास गिनती की चीज़ें हों| वायसरीन तो सारे देश के मालिक की भी मालकिन थीं| उन्हें किसी भी वस्तु की संभाल करने की क्या ज़रुरत थी|
 
कहते हैं, उनके पास एक सोने के कंगनों की जोड़ी थी जो उन्हें उनकी माँ ने भारत आने से पहले भेंट की थी| मामूली औरतों को भी माँ की दी हुई चीज़ सो भी सोने की, बहुत प्रिय होती है| और याद रहे, यहाँ तो देने वाली वायसराय की सास थी और लेने वाली वायसराय की बीवी| कंगनों की जोड़ी मेमसाहब को प्राणों से भी ज़्यादा प्रिय थी|
 
एक बार की बात, लेडी साहिबा के नाज़ुक से दिल में माँ की याद जागी| मन उखड़ सा गया| अनमनी सी रहने लगीं| उनकी उदासी की वजह जानकर वायसराय साहब ने उन्हें एक दिन मशवरा दिया कि आज माँ के दिए हुए कंगन पहन लो, तुम्हें लगेगा कि माँ आस-पास ही हैं| इस मामले में यारों ने यह भी शिगूफा छोड़ दिया या था कि वायसराय साहब को दिल में यह डर सताने लगा था कि कहीं लेडी अपनी माँ को बुलाने की जिद्द न ठान लें और सास के आने की सम्भावना के जन्मने से पहले ही साहब बहादुर ने युक्ति से उसका काम तमाम कर दिया|
 
साहब की बात सुनते ही लेडी का मन खिल गया| सीधी अपने कमरे में पहुँची| कंगन का डिब्बा निकाला| डिब्बा देखते ही लेडी का मन उछाह से भर गया| उसे खोलते हुए उनका नाज़ुक सा दिल इतना भावुक हो गया कि हाथ काँपने लगे| डिब्बा खुला तो पाया गया कि उसमें एक ही कंगन था, दूसरा नदारद| लेडी का दिल बैठ गया| खोज कराई गयी, पर कोई फ़ायदा नहीं| वायसराय साहब को तुरंत जनानखाने में तलब किया गया| कुछ मिनटों बाद ऊँचे अँगरेज़ पुलिस अधिकारी को समन किया गया| उसे बता दिया गया कि अगर कंगन न मिला तो नतीजा भुगतने के लिए तैयार रहे|
 
जांच शुरू हुई| एक-एक नौकर, मुलाजिम को पूछ-ताछ के लिए बुलाया जाने लगा| अब ऐसे मामलों में समय तो लगता ही है| इसमें भी लगने लगा| इधर देरी हुई और उधर लेडी की बेचैनी बढ़ने लगी| खुशियाँ फैलाने पर फैलती हैं और व्याकुलता गाजर घास की तरह अपने आप| नतीजा यह कि वायसराय बहादुर का गुस्सा भी बढ़ने लगा| उसपर भी तुर्रा यह कि वायसरीन हर मिनट पर वायसराय की हैसियत और नीयत पर सवाल खड़ा कर देती थी| जवाबी कार्रवाई में वायसराय साहब पुलिस अधिकारी को डांट पिलाते और धमकियाँ देते|
 
जो हर घर में होता है, यहाँ भी वही हुआ| लेडी के तानों उलाहनों से वायसराय बहादुर परेशान रहने लगे| वायसराय की धमकियों से पुलिस अधिकारी उदास रहने लगे| मारे बेज्जती के उन्हें न खाने की सुध रहती, न पीने की| लाल-लाल फूल सा चेहरा मुरझाकर बेरौनक हो गया| पत्नी ने उदासी का कारण पूछा| सुनकर उसने आम बीवियों की तरह फ़ौरन सलाह दी –
 
“यह काम किसी दूसरे छोटे अधिकारी को क्यों नहीं सौंप देते| दूसरा मरे तो मरे, तुम अपनी जान बचाओ|”
 
बात जम गयी| चार्ज एक छोटे अधिकारी को दे दिया गया| अब पत्नी तो पत्नी होती है| उसकी पत्नी ने भी उसे यही सलाह दे दी| गर्ज़ यह, कई पुलिस अधिकारियों को एक बाद एक अपनी बारी आने पर अपनी पत्नियों से यही सलाह मिलने लगी| मामला नीचे से और भी नीचे के अधिकारियों तक आने लगा| म्याऊँ के ठोर को कौन पकड़े, सब उसे आगे बढ़ा देते थे|
 
होते होते मामले का चार्ज एक बूढ़े हवलदार के पास आ गया| किस्मत की बात देखिए, उसकी शादी नहीं हुई थी| उसे सलाह कौन देता| पर वह भी था पुराना सरकारी कारिन्दा जो घाट घाट का पानी पीये बैठा था| उसने अपनी व्यवहार-बुद्धि से काम लिया और वायसराय के हुज़ूर में पेश होकर अर्ज़ किया कि उसे कुछ सुराग मिले हैं| उसने दरख्वास्त की कि जाँच के सिलसिले में कुछ दिन के लिए कंगन उसे दे दिया जाये| वायसराय किसी भी तरह इस मामले को सुलझाना चाहते थे| कोई और चारा न था| मरता क्या न करता, वायसराय ने वायसरीन से इल्तजा की| वायसरीन भी मामले की तह तक जाना चाहती थीं| कंगन हवलदार के हवाले कर दिया|
 
बूढ़ा हवलदार कंगन लेकर दूसरे शहर पहुँचा| वहाँ के एक हुनरमंद सुनार से ताँबे का हू-ब-हू वैसा ही दिखने वाला दूसरा कंगन बनवाया| उसपर सोने का पानी चढ़वाया| लौटकर बंगले के एक नौकर को डरा-धमका फंदे में फंसाया और चोरी कबूलने पर मजबूर कर दिया|
 
किस्सा कोताह यह कि कंगन की बरामदगी दिखा दी गई| चोर नौकर ने चोरी कबूल कर ली| नौकर को नौकरी से हटा दिया गया| कंगन लेडी को सौंप दिया गया और हवलदार को ‘खोज बहादुर’ की उपाधि प्रदान करके दारोगा बना दिया गया| बिंध गया सो मोती, रह गया सो सीप|
 
आप जानिए, मामला यहीं ख़त्म नहीं हुआ| एक दिन सफाई करते हुए दराज के कोने में रखा हुआ असली कंगन मिल गया......|
 
अब आगे क्या कहूँ, आप खुद ही समझदार हैं| लेडी ने वायसराय को उपालंभ दिया| वायसराय ने पुलिस अधिकारी को फटकार बताई| पुलिस अधिकारी ने छोटे अधिकारी गरियाया| उसने अपने से छोटे वाले अधिकारी को हड़काया| उसने अपने मातहत को आड़े हाथों लिया| चलते चलते बात बूढ़े हवलदार तक पहुँची|
 
बूढ़े हवलदार से ‘खोज बहादुर’ की उपाधि छीन कर और उसे गर्दनिया देकर नौकरी से बाहर करने का परवाना वायसराय हुजूर के दफ्तर से जारी कर दिया गया| हवलदार की उपाधि तो चूँकि मुँहज़बानी दी गयी थी इसीलिये मुँहज़बानी ही वापस ले ली गयी| पर, पेंच उसे नौकरी से निकालने वाली बात पर फँसा| उसे नौकरी से बाहर नहीं निकाला जा सकता था| वजह यह, इस घटना को घटे कई माह बीत चुके थे और बूढ़ा हवलदार तब तक रिटायर होकर अपने गाँव चला गया था| सुनते हैं, आज डेढ़ सौ साल के बाद भी परवाना हुक्म की तामील होने के इंतज़ार में दफ्तर की किसी दराज में पड़ा हुआ है|
 
बेगुनाही साबित होने के बाद वायसरीन की जिद्द पर नौकर को नौकरी पर फिर से बहाल किया गया|

सब यथावत् हो गया बस, कंगन की बरामदगी से वायसराय की जो थोड़ी बहुत इज्ज़त लेडी की निगाह में बढ़ी थी, वह जाती रही|
 

1 comment:

  1. all the government office works such as till date

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