अपनी बात

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Sunday, August 23, 2015

सपनों का मर जाना......

पढ़ा था, सामान्यतया स्वप्न केवल बीस सैकेंड तक चलते हैं, लेकिन वे कहीं अधिक बड़े महसूस होते हैं और प्राय: हम उनका सारे जीवन पीछा करते रहते हैं| बात सही है या गलत, इसपर कोई बहस नहीं है| पर, कमाल तो यह है कि सपना तो सपना होता है, फिर भी अपना होता है| अचेतन है, स्वप्न है, सुषुप्ति है, निर्मूल और निराकार है पर, फिर भी है| नहीं है, पर है| दीवार पर घोड़े की तस्वीर बनी है, वो घोड़ा नहीं है, पर फिर भी घोड़ा ही है| अजीब मायाजाल है| समझ में नहीं आता कि सपना सच है, उसका महसूस होना सच है या उसकी खोज सच है..... कुछ न कुछ तो सच होना चाहिए| सब-कुछ तो झूठ नहीं हो सकता| मानवता हर पड़ाव पर इस कशमकश को झेलती रही है|

ओशो ने कहा, "मैं तुम्हें जागने के लिये विवश कर रहा हूँ। बहुत हो चुका। तुमने बहुत सपने देखे; आदिकाल से तुम सपने देख रहे हो। तुम बस सपनों को बदल रहे हो। जब एक सपने से तुम्हारा मन भर जाता है तो तुम इसे बदलने लगते हो; तब तुम दूसरा सपना देखने लगते हो। मेरा पूरा प्रयास है कि तुम्हें झंझोड़ दूँ, तुम्हें झकझोर दूँ - ताकि तुम जाग जाओ।"

पलटू कहते हैं – “सपना यह संसार”

कबीर कहते हैं – “यह संसार जानि के सपना|” उन्होंने वहाँ पर प्रवेश किया जहाँ कोई दिन – रात की तो बात क्या, सपने में भी प्रवेश नहीं कर सकता -

बसुरि गमि न रैरणि, गमि नां सुपनैं तरगंम।
कबीर तह़ाँ बिलंबिया, जह़ाँ छांहड़ो न घंम॥

कबीर साहब को ऐसी सुन्दर बात कहने के लिए धन्यवाद| वे बिलकुल ही दूसरी बात कहते हैं| हम अपनी सोच की सीमा आकार-निराकार, सत्य-मिथ्या, चेतन-अचेतन, मूर्त-अमूर्त तक ही बांधें बैठे है, पर कबीर दास जी उससे भी आगे की बात करते हैं| उन्होंने आकार-निराकार, अदृश्य-दृश्यमान से भी आगे की बात कह दी है| विधि इन सभी से अलग है| सही बात है, पर ध्यान देने वाली बात ये है कि उन्होंने विधि को साकार या निराकार, दोनों ही नहीं कहा है, बल्कि इन दोनों से अलग माना है| इस बात को मैं फिर स्वप्न से जोड़ता हूँ| तो क्या स्वप्न, सत्य और मिथ्या दोनों से अलग ही कोई शै है? क्या आश्चर्ययही उसकी संज्ञा है?

बहुत बढ़िया बात कही गईं हैं| दार्शनिक का विचार हैं| जीवन के बहुत निकट हैं| जीवन को दिशा देते हैं| दार्शनिक जागृति की ओर ले जाते हैं| भ्रम के जाल जो सब और फैले हैं, काटते हैं| मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं| इधर ये बावला मन है, जो कुछ और ही कहता है

सपना क्या है, नयन-सेज पर सोया हुआ आँख का पानी,
और टूटना उसका है ज्यों, जागे कच्ची नींद जवानी | (नीरज)

इसी में एक पंक्ति और भी है
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है | (नीरज)

ध्यान से देखें तो एक बात बहुत साफ़ है चाहे दार्शनिक हो या कवि हो, दोनों ही स्वप्न और जीवन में अभेद बनाए हुए है, याने जीवन और स्वप्न को अलग अलग नहीं मानते है| इसीलिए मेरे पूज्य पिताजी अक्सर कहते हैं कि कविता की अंतिम और तार्किक परिणति (Culmination) दर्शन ही है|

सभी कवि और दार्शनिक अपनी अपनी जगह सही ही होंगें, लेकिन अज्ञान भी कईं बार जिन्दगी को सरस बना देता है|

पता नहीं किसका है, पर बड़ा मौजूँ शेर है

ज़हन में घिर गया वो ला-इंतहा क्योंकर हुआ
जो समझ में आ गया वो खुदा क्योंकर हुआ|

अगर स्वप्न का अणु-संयोजन समझ में आ गया तो स्वप्न से जुड़ी सारी कशिश ही समाप्त हो जाएगी|

मशहूर पंजाबी कवि पाश ने क्या खूब लिखा

सबसे भयानक होता है, सपनों का मर जाना......

यूँ भी, सपने देखने के लिए किसी गुदगुदे बिस्तर की ज़रुरत नहीं, सुख – शान्ति की दरकार नहीं, बस थककर ज़मीन पर लेटिए और अपनी पलकों के भीतर भविष्य को रूप लेते हुए देखिए| फिर जागिये और देखी हुई रूपरेखा को यथार्थ के धरातल पर उतारने के उद्योग में लग जाइए| इस सन्दर्भ में सबसे मज़े की बात तो यह है कि हम केवल अपने ही नहीं, बल्कि अक्सर दूसरों के सपनों के पीछे भी भागते हैं, उन्हें पूरा करने लिए, क्योकि हम उन सपनों को नहीं, उन सपनों को देखने वालों को प्यार करते हैं|

किसी ने क्या खूब कहा था कि सपने कल के प्रश्नों को आज का उत्तर हैं| प्रश्न नहीं होंगे तो उत्तर नहीं होंगे और अगर दोनों नहीं होंगे तो जीवन नहीं होगा| जीवन से प्यार करता हूँ, सपनों से प्यार करता हूँ| इसीलिए सपनों को जीता हूँ, भरपूर जीता हूँ| जीवन के सत्य की खोज में लगे हुए महापुरुष मूढ़ कहें, नासमझ कहें, गैरजिम्मेदार कहें या जान-बावला कहें पर, मैं तो स्वप्न में जीवन की खोज करता हूँ| मिलना, न मिलना समय तय करेगा लेकिन मैं अपने काम में लगा हूँ|

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