अपनी बात

"ब्लॉग, जो विधाओं की सीमा से परे होकर अभिव्यक्ति की बात करता है, जो विचार की बात करता है चाहे वह कहानी, हास्य, व्यंग्य, कविता, समीक्षा, लेख, डायरी, भाषण, निबंध जैसे किसी भी रूप में हो; जहाँ भावना की प्रधानता भाषा से किसी भी रूप में न्यून नहीं है; जिसके विषय में घर, परिवार से लेकर फिल्म, नाटक, साहित्य, समाज, खेल, राजनीति, अर्थशास्त्र, कला आदि सभी आ जाते हैं|"

Saturday, August 22, 2015

ब्रांड एम्बेसडर

दोपहर तक बिक गया बाजार का हर एक झूठ
और मैं एक सच लेकर शाम तक बैठा रहा

बाज़ार का ज़माना है| कमाने और खर्चने की महिमा का चारों ओर बखान चल रहा है| खरीददार हैं, दुकानें हैं, और हैं ब्रांड जो पैसे बनाने का जांचा – परखा ज़रिया हैं| ब्रांडिग का जलसा गली - गली में मनाया जा रहा हैं| चैनल, अखबार वाले चांदी के जूतों की मार खा - खा कर इस जलसे को महिमा-मंडित करने में लगे हुए हैं|
 
सच में, अब गलियों और चबूतरों पर ‘इक्कल – दुक्कल’ का खेल नहीं खेला जाता| ‘पोशम्पा भई पोशम्पा’ के डाकिये ने क्या किया, इससे किसी को सरोकार नहीं है| मछली से पानी की गहराई नहीं पूछी जाती| ‘अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो’ में अस्सी, नब्बे या पूरे सौ हैं कि नहीं इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता| सारा मामला आकर बैलेंसशीट पर सिमट जाता है|

कौन, क्या और कितना बेच सकता है, इस आधार पर लोगों की कीमत तय होती है| हर व्यक्ति अपने आप को सबसे बड़ा बेचू साबित करने की दौड़ में लगा हुआ है| अभिनेता फिल्म-नगरी के, खिलाड़ी बगल की दुर्गन्ध हटाने वाले सुगन्धित तरल पदार्थों के, लेखक और चिन्तक विचारों और वादों के ब्रांड एम्बेसडर बन गए हैं| कच्छे – बनियान, जूते – मौजे, बाल उगाने के तेल और बालसफा साबुन, दवा – दारू, सेहत बढ़ाने वाले घी और कोलेस्ट्रोल घटाने वाली व्यायाम की मशीने; सब धड़ाधड़ बेचा जा रहा है| बेचने वाले चतुर हों तो खरीदने वाले मूढ़ तो मिल ही जाते हैं| बड़े बाप का बेटा बढ़ कर हाथ मारता है और जुम्मन मियाँ ढड्डू का पाड़ा बने हाथ झुलाते घर की तरफ लौट पड़ते हैं|
 
यह सारी कसरत है किस के लिए! रुपये के लिए| वही रुपया जिस पर गांधी बाबा की तस्वीर छपी होती है; चश्मा लगाए विचारमग्न मुद्रा में| स्वाभाविक ही है कि वे विचारमग्न मुद्रा में नोट पर बैठे हैं| जो आदमी सारी ज़िंदगी मितव्ययिता की बात करता रहा, सादा जीवन उच्च विचार का नारा लगाता रहा, स्वावलंबन का विचार दुनिया को देता रहा; वही अचानक मक्कारी, बेईमानी और लालच के प्रसार में भागीदार हो गया|
 
उनकी टोपी अब जादूगर का हैट बन गयी है| पर, फर्क यह है कि उसमें से अब कबूतर और खरगोश नहीं निकलते| निकलते हैं तो विदेशी बैंकों के खाते, बड़े - बड़े ठेके और दलाली के समाचार| खद्दर भी उन्होंने ही दे थी| अब उस खद्दर का प्रयोग घूसखोरी और भ्रष्टाचार के मामलों की गठरी बनाकर जनता की नज़रों से बचाने में किया जाता है | उसका प्रयोग चेहरों पर ही नहीं बल्कि आत्मा पर लगे दागों को पोंछने में और और काले को सफ़ेद बनाने में किया जाता है| उनकी लाठी अब हथियार की तरह काम करती है| वह गरीब की पीठ पर पड़ती है तो कमर तोड़ ही देती है| उसकी मूठ भी अब खुरदुरी नहीं रही| उसपर सोना मढ कर हीरे - जवाहरात जड़ दिए गए है| वह अब उसी के पास रह सकती है जिसमें उसे खरीदने की ताब हो|
 
याद आया, उसने एक और भी चीज़ दी थी सत्य ! काफी खोजबीन की तो पता चला कि सत्य काफी दिन तक टोपी, खद्दर और डंडे के कब्ज़े में रहा था| उन तीनों ने मिल कर उसमें संशोधन, परिवर्धन और मिलावट करने के बाद उसे हरे नोटों पर तस्वीर के रूप में छाप दिया और अपनी जेबों में छिपा कर रख लिया ......... और इतनी ऊँची आवाज़ में सत्यमेव जयतेका नारा लगाया कि सत्य के अपने ही कान के परदे फट गए और वह बहरा और भ्रमित होकर जेबों के अंदर और भी ज़्यादा सिमट और दुबक कर बैठ गया|
 
आजकल सुनने में आया है कि टोपी, खद्दर और लाठी तीनों मिलकर सत्य के ब्रांड एम्बेसडर बने हुए हैं|

3 comments:

  1. यह ब्लॉग बहुत सुन्दर तरह से रचित है। और क्योंकि यह लेख हमारे जीवन के एक महत्वपुर्न्ड हिस्से, धन, के बारे में बात करता है, हम इससे पढ़ने के लिए उत्साहित होते हैं। यह लेख बहुत सुन्दर तरह से गठित है और इस में प्रयोग हुई चव्विकललपना के कारंड, पढ़ने वाले को और भी जादा मज़ा आता है। पूरणदाता में इतना कहना चाहूंगा की इस लेख को पढ़ने से मुझे कई चीज़ें पता चली और मैं इस लेखन शैली से प्रेरित हुआ हूँ।

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  2. बहुत अच्छा लिखा है सर. सच ही बात है. आज की दुनिया में लोग इतने नकली हो गए है की वह जो चीज़ो को पेश करते है, उसमें विस्वाश नहीं करते वह उसका असली मतलब या उसकी असली प्रेरणा नहीं समझते। जैसा आपने ब्रांड अम्बस्स्दोरो के बारे में कहा, आज कल तो समझ लीजिये कोई फिल्म का अभिनेता किसी उत्पाद की चर्चा करता है तो वह वे इसी लिए कर रहा है क्योंकि उससे उसके लिए पैसे मिल रहे है. उसे चाहे वह उत्पाद पसंद आये या ना आये, उसका उस उत्पाद में विशवास हो न हो पर उसको उसकी चर्चा करने के पैसे मिल रहे है और इसी लिए वह यह कर रहा है. और जैसे आपने एक रूपये में गांधी को एक रूपक की तरह इस्तेमाल किया वह भी बहुत प्रशंसा योग्य है. जैसा मैंने पहले भी बोला था, लोग जिन चीज़ों को पेश करते है वह उसका असली मतलब नहीं समझते हैं. जैसे टोपी, खद्दर और लाठी सच्चाई के ब्रांड एम्बेसडर बन गए थे, वह यह बन कर जिन चीज़ों का गांधी प्रतिक है, रूपये के नोट पर (सच्चाई), उसको छिपा रहे थे और हमें उससे समझने में परेशानी हो रही थी. अंत में मैं बस यही कहना चाहूंगा की यह ब्लॉग हमे अपना सन्देश देने की क्रिया में सफल रहा है.

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  3. इस ब्लॉग में ब्लॉगर ने समाज में फैले व्यभिचार का वर्णन दिया हैं। इंसान ने किस कदर पैसे के माइनो में मुखोटा धारण कर लिया हैं। बाज़ारी दुनिया ने इंसान को मतलबी और नसमाझ बना दिया हैं। भूमंडलीकरण और भारत में राजनैतिक बदलाव आने से इंसान पैकेट फ़ूड खाना पसंद करता है। इंसान पहले खाने पर खर्चता है फिर दवाइयाँ। काफी अचे रूप से ब्लॉगर ने अपने ख़यालात शब्दों में बांध के रेक हैं। यह ब्लॉग समाज का आइना हैं।

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