अपनी बात

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Friday, August 21, 2015

शीशे और सलाखों वाली खिड़कियाँ

No problem can be solved from the same level of consciousness that created it. - Albert Einstein

खिड़की के बाहर की तरफ लोहे की सलाखें लगीं हैं और भीतर मोटे गेज़ का शीशा| हिफाज़त को ध्यान में रख कर यह इंतज़ाम किया गया था| सभी सयाने सुरक्षा का यही उपाय बताते हैं| पता नहीं क्यों आज कईं बार उसके पास खड़ा हो चुका हूँ|

सुबह, दूर बहुत दूर धरती के एक कोने से बादल उठते दिखाई दिए; काले, घने और भरे - भरे से बादल| लगा, आज वर्षा होगी|

थोड़ी देर बाद सामने खड़े कचनार के पत्ते लरजने लगे| शायद हवा चली थी|

ज़रा सी देर में ही इस छोर से उस छोर तक आसमान नीले से काला हो गया और फुहारें पड़ने लगीं| दम भर में फुहारें पानी की मोटी बूंदों में बदल गयीं| शीशे पर धुंध सी जमने लगी| कदाचित् मौसम थोड़ा ठंडा हो गया था|

बारिश पड़ी, और जम कर पड़ी| सड़क पर पानी जमा होने लगा| बच्चे अपनी छोटी–छोटी कमीजें उतार कर पानी में अठखेलियाँ करने लगे| दोस्तों के साथ धमा-चौकड़ी और भाग–दौड़ होने लगी| एक दूसरे पर पानी उछालते, जानबूझ कर पानी में गिर जाते और गिरते-गिरते अपने साथ एक-दो को और गिरा देते| गिरने वाले उठते और गिराने वाले को फिर से पानी में धकेल देते| सभी के चेहरे पर हंसी थी, उल्लास था| संभवतया दोस्तों का साथ और पानी में खेलना बहुत आनंद देता है|
मन हुआ, खिड़की का शीशा खोलूँ और ठंडी हवा को भीतर आने दूँ| मन हुआ, खिड़की की सलाखें हटाऊँ और दो–चार अंजुरी बारिश के पानी की भरकर फुदकते, किलकते और ललकते बच्चों पर डालूँ| बदले में शायद वे भी मुझे खींच बाहर निकालें, पानी में धकेलें और अपने खेल में शामिल कर लें|

एक बार को तो मन बना भी लिया कि रुकावटें हटाकर और वर्जनाएँ तोड़कर मौसम का हिस्सा बनूँ, बाजू को बाहर के खुले विस्तार में निकालकर पानी के गीलेपन को जी कर देखूँ, मेंह के छींटों की नाज़ुक चोट को अपने गालों पर अनुभव करूँ और आखिरकार बाहर को भीतर और भीतर को बाहर में मिला दूँ; लेकिन फिर सुरक्षा की फ़िक्र हो आयी| सलाखों और शीशे के होने की ज़रुरत याद आ गयी| ध्यान आ गया कि अपने घर का तो अस्तित्व ही मज़बूर अभेद्य खिड़कियों से है| खिड़की बंद की बंद रह गयी|

“जाने कितनी खिड़कियाँ कैद हैं पूर्वाग्रह की सलाखों और दुराग्रहों के मोटे गेज़ के शीशों के इस पार|”

फूल तो फूल हैं आँखों से घिरे रहते हैं,
कांटे बेकार हिफाजत में लगे रहते हैं |
 
 

2 comments:

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  2. Concluding words are beautiful.. simply amazing.. pure nostalgia!

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