अपनी बात

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Wednesday, August 19, 2015

उम्मीद पे दुनिया

उम्मीद है क्या? निष्क्रिय, दब्बू और अप्रतिरोधक कोख जहाँ से सपने जनमते हैं| कुछ सपने ताकत और अधिकार के होते हैं, तो कुछ ज़िंदा रहने भर के| ताकत और अधिकार के सपने बड़ी दुनिया में आँख खोलते हैं| स्वाभाविक है, सपने बड़े हैं तो उनके पलने - बढ़ने के लिए जगह भी बड़ी चाहिए| लगातार साँस लेने लायक बने रहने के सपने कहीं किसी छोटी सी दुनिया में पैदा होने और पलने लगते हैं|
 
सपने लगातार जनमते रहते हैं और दुनिया आकार लेती रहती है|
 
बचपन से सुनते आये हैं कि उम्मीद पे दुनिया कायम है| महान लोग कहते हैं तो सच ही होगा| बड़े का सच ही तो सच होता है| आइये, लगे हाथ छोटे का सच भी देख लें| मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी अगर इस सच को झूठ भी मान लिया जाए| एक आँखो-देखी घटना सुनाता हूँ –
 
बाज़ार में दूकान थी| दूकान थोड़ी देर के लिए बंद थी| दुकानदार दोपहर में खाना खाने घर गया हुआ था| सामने एक भिखारी अपना तामझाम लिए बैठा था; निगाहों के सूनेपन को उम्मीद से भरकर| अपने एल्युमिनियम के गंदे, बेडौल और छोटे से कटोरे को बड़े जतन से टिकाया हुआ था| भिखारी को लगा था कि आज दूकान की छुट्टी है, सो उसके आगे थोड़ी सी दूरी तक खिंची छाया में बेख़ौफ़ होकर डेरा जमा लिया था| इसी बीच दूकानदार की आमद हुई| दरवाज़े पर उस घृणित, बदबूदार भिखारी को देखा तो पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया| आग-बबूला होकर गालियों की बौछार शुरू कर दी| जैसे ही लगा कि भिखारी नाखुशी जताने की कोशिश कर रहा है, तैश में आकर भिखारी को लात जमा दी|
 
कुछ पा लेने की उम्मीद को चोट लगी तो परिणाम यह हुआ कि एक छोटी सी दुनिया टनटनाती हुई सड़क को पार करती हुई नाली की ओर लुढ़क चली| दुनिया का मालिक उसके पीछे भागा| उसमें रखे कुछ सपनों के भ्रूण बिखर कर पैरों के नीचे कुचले जाने लगे| पैरों में आँख तो होती नहीं, फिर राह पर किसी के लिए, किसी को बचा कर चलने का कोई बहाना ही नहीं रह जाता| उधर, बड़ी दुनिया का मालिक छोटी दुनिया के छोटेपन को गरियाता हुआ अपनी दुनिया का शटर उठाने के जतन में लग गया|
 
दो-चार सोचने-समझने वाला होने का दम भरने वाले लोग भले ही इस घटना पर नाक भौं सिकोड़ते रहें, लेकिन बड़े का बड़ा सच यही है कि जो भी हुआ तार्किक रूप से उचित ही हुआ| यूँ भी जो हुआ, न तो पहली बार हुआ और न ही आखरी बार| असंख्य दुनियाँ रोज़ सड़कों पर टनटनाती हुई सड़क के किनारे बनी नालियों की तरफ लुढ़कती दिखाई देती हैं|

बड़ी इमारतों की छाया मैली बस्तियों को निगल जाती हैं| छोटे-छोटे हाथ बड़े-बड़े कारखानों की भट्ठी में ईंधन बन जाते हैं| एक बड़ा पेट न जाने कितने नन्हें-नन्हें पेट पचा जाता है| बड़ी कहानियों में छोटी-छोटी कहानियाँ गुम हो जाती हैं| बड़े पेड़ के नीचे छोटा पेड़ तक नहीं पनपता, तो बड़ी दुनिया के नीचे छोटी दुनिया कहाँ से पनप जायेगी| बड़ापन छोटेपन को खा जाता है| यही तो बड़े के बड़ा होने की कीमत है जिसे वह छोटे से वसूलता है|
 
किसी दिन सिर नीचे झुकाकर और आँखें पैरों में लगाकर राह पर चलिए, बड़ी दुनिया की ठोकरें खाकर बिखरे हुए असंख्य शिशु स्वप्न बिलबिलाते हुए दीख जायेंगे|
 
उम्मीद कितनी भी बड़ी हो पर उसपर टिकी दुनिया उस बिंदु पर आकर ख़त्म हो जाती हैं, जहाँ से दूसरी बड़ी दुनिया की छाया शुरू होती है|

यह सदी धूप को तरसती है
जैसे सूरज को खा गया कोई (कैफ़ी आज़मी))

1 comment:

  1. सर, आपने यह बहुत अच्छा लिखा है। इसमें अलग अलग जगह में रूपक का इस्तेमाल भी बहुत सराहनीय है।

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