अपनी बात

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Tuesday, August 18, 2015

मैं अपने शहर में होता तो...

जानता नहीं था कि किसके, किस शेर का हिस्सा है यह; इधर-उधर खोजा तो पता चला कि पूरा शेर इस तरह है –

ये सर्द रात, ये आवारगी, ये नींद का बोझ
मैं अपने शहर में होता तो घर चला जाता |

आवारगी का तो मज़ा ही सर्द रात में है| ऐसी सर्द रात जिसमें अन्धेरा इतना हो कि हाथ को हाथ न सूझे| जिसमें कुहासा इतना कि इस बात की बिल्कुल खबर न हो कि अगले पल में क्या सामने आने वाला है| आकस्मिकता खून में नया जोश भरती है| तैयारियों के साथ सफ़र पर निकले तो क्या सफ़र किया! मंजिलें पहले से ही तय हैं तो सफ़र में नयापन कहाँ रह जाता है|

घर पांवों में बेड़ियाँ बाँध देता है| अगर घर बन जाए तो आवारगी ख़त्म| और, आवारगी ख़त्म तो ज़िंदगी ख़त्म| ज़िंदगी के बदले में घर? सौदा काफी मुश्किल है| सामान अच्छा है पर कीमत भी तो देखिए!

नींद का बोझ कहाँ होता है? नींद आती है तो सोने की आस रहती है| आस से से ज़्यादा मधुर क्या होता है, मेरी राय में कुछ नहीं| अलबत्ता, शास्त्रकारों का मानना कुछ और ही है –

आशाया: ये दासा: ते दासा: सर्वलोकस्य |
आशा येषाम् दासी तेषाम् दासायते लोक: ||

यानि जो आशा के दास होते हैं वे तो सारी दुनिया के दास होते है और दूसरी ओर आशा जिनकी दासी होती है सारी दुनिया उनके इशारों पर चलती है|

किसी एक शहर को अपना मानने से ज़्यादा बड़ी भूल क्या है! किस शहर को अपना माना जाए? उसे जहाँ पैदा हुए, उसे जहाँ पले-बढ़े, उसे जहाँ रोटी मिली, उसे जहाँ नाम कमाया या उसे जहाँ रहते हुए आवारगी का ख्याल मन में आया| वे शहर अपने क्यों नहीं है जहाँ की धूल जूतों पर, कन्धों पर और थैले पर जमी हुई है|

मेरा शहर मेरे साथ चले, नींद मेरी बाजू पर सर रख कर सो जाए, आवारगी मेरी परछाई बन कर मेरे साथ रहे, सर्द रातें मेरे कम्बल के भीतर दुबक कर सोयें और नींद मेरी पलकों के भीतर छुप कर सन्नाटे का मज़ा ले तो ज़िंदगी का मज़ा कईं गुना बढ़ जाएगा|

4 comments:

  1. काफी अच्छा लिखा है सर.....

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  2. धन्यवाद!
    तरतीब से ज़्यादा विचारों की और उनसे भी ज़्यादा भावनाओं की संभाल करने की कोशीश थी|

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  3. धाराप्रवाह भाषा एवं कल्पनाशीलता का अद्भुत समन्वय -----

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