अपनी बात

"ब्लॉग, जो विधाओं की सीमा से परे होकर अभिव्यक्ति की बात करता है, जो विचार की बात करता है चाहे वह कहानी, हास्य, व्यंग्य, कविता, समीक्षा, लेख, डायरी, भाषण, निबंध जैसे किसी भी रूप में हो; जहाँ भावना की प्रधानता भाषा से किसी भी रूप में न्यून नहीं है; जिसके विषय में घर, परिवार से लेकर फिल्म, नाटक, साहित्य, समाज, खेल, राजनीति, अर्थशास्त्र, कला आदि सभी आ जाते हैं|"

Sunday, August 16, 2015

आओ, कुछ तीखा हो जाए...


सम्माननीय देवियों और सज्जनों,
आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं|
अक्सर मैं सोचता हूँ कि स्वतंत्रता आखिर है क्या? मेरे इस प्रश्न का उत्तर मिला जब मैंने कविकुलगुरु रविन्द्रनाथ टैगोर की ये पंक्तियाँ पढीं –

Where the mind is without fear and the head is held high,
Where knowledge is free
Where the world has not been broken up into fragments
By narrow domestic walls
Where words come out from the depth of truth
Where tireless striving stretches its arms towards perfection
Where the clear stream of reason has not lost its way
Into the dreary desert sand of dead habit
Where the mind is led forward by thee
Into ever-widening thought and action
Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.

इसका सार इस प्रकार है –

जहां चित्त भयशून्य है और सिर गौरव से ऊंचा है; जहां ज्ञान मुक्त है; जहां विश्व संकीर्ण दृष्टि की दीवारों द्वारा छोटे छोटे टुकड़ों में विभक्त नहीं हो गया है; जहां शब्द सत्य की गहराई से निकलते हैं;उस स्वतन्त्रता के स्वर्ग में, हे परमपिता, मेरे देश को जागृत करो !!जहाँ शब्द सत्य की गहराई से निकलते हैं; जहाँ अथक कर्मधारा अपने हाथ पूर्णता की ओर फैलाती है; जहाँ विचारों के स्वच्छ स्रोत ने तुच्छ आचारों की विस्तृत मरुबालू की राशि में अपना पथ नहीं भूला है; जहाँ मन निरंतर विचार और कर्म में तुम्हारे द्वारा परिचालित होता है; उस स्वतंत्रता के स्वर्ग में, हे परमपिता, मेरे देश को जागृत करो!!

मेरा मानना है कि हमारा व्यक्ति, समाज या राजनैतिक दल के रूप में इसी आधार पर मूल्यांकन होता है कि हमने ऐसे देश और समाज का निर्माण करने में कितना योगदान दिया जहाँ भय का नाम न हो, सभी को सम्मान से जीने का हक हो, ज्ञान को वाद और मतों में बाँध न दिया गया हो, मन-वचन-कर्म में निरंतरता और एकरूपता हो|

संस्कृत में एक कहावत है – ‘कारणं विना मन्दोपि न प्रवर्तते’ यानी अकारण कोई बुद्धिहीन व्यक्ति भी किसी काम में नहीं लगता| मेरे वक्तव्य का प्रमुख उद्देश्य राजनैतिक दलों में आत्मावलोकन और आत्ममंथन की इच्छा और आवश्यकता को रेखांकित करना है|

मैं अगर अपनी बात कहूँ, न तो मैं किसी राजनैतिक दल का प्रशंसक हूँ, न निंदक; न ही समर्थक हूँ, न विरोधी| मैं अपने वक्तव्य में यह कहूंगा कि एक सामान्य नागरिक के रूप में मेरी राजनैतिक दलों से क्या अपेक्षाएं है| उन अपेक्षाओं पर आपका दल कितना खरा उतरता है इसका निर्धारण मैं आप पर ही छोड़ता हूँ| आपकी नीर-क्षीर विवेकिता पर मुझे पूरा विश्वास है| विषय में विचार करने के दौरान मेरा दृष्टिकोण पूरी तरह अकादमिक ही रहेगा| इसकी प्रायोगिकता और प्रासंगिकता की कसौटी आपका विवेक रहेगा|

सबसे पहले यह समझ लिया जाए कि राजनैतिक दल होता क्या है| राजनैतिक दल एक राजनीतिक संस्था होती है जिसका लक्ष्य शासन में राजनीतिक शक्ति प्राप्त करना और उसका उद्देश्य प्राप्त की हुई राजनैतिक शक्ति को बनाए रखना होता है| अपने लक्ष्यों और उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए दल विविध प्रक्रियाओं का सहारा लेता है जिनमें जनतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत सबसे प्रमुख चुनाव की प्रक्रिया होती है| हाँ, यहाँ हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि राजनैतिक दलों के गठन में सबसे महत्त्वपूर्ण एक स्थापित सिद्धान्त या लक्ष्य (विज़न) होता है जो प्राय: लिखित दस्तावेज के रूप में होता है। यह वही दस्तावेज़ है जो लक्ष्य और उस लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है|

परेशानी तब सामने आती है जब नीति-घोषणापत्र और व्यक्तिविशेष के बीच टकराव होने लगता है| टकराव के कारण अहंकार और महत्त्वाकांक्षा से लेकर नियंत्रण की प्रवृत्ति तक कुछ भी हो सकते हैं| ऐसी स्थिति में जब व्यक्ति को नीति-घोषणापत्र पर तरजीह दी जाती है तो इसका असर सीधा सीधा यह होता है कि जनता की नज़र में आपके नीति-घोषणापत्र की विश्वसनीयता घटने लगती है और साथ में आपकी भी क्योंकि जनता जनार्दन आपको आपके नीति विषयक विचारों के माध्यम से ही पहचानती है|

असल में लक्ष्य और उस लक्ष्य तक पहुँचने का रास्ता सामाजिक सरोकारों को ईमानदारी के साथ ध्यान में रख कर तैयार किये गए नीति-घोषणापत्र के भीतर ही छिपा रहता है| वही आपकी कुरआन है, वही आपकी बाइबिल हैं और वही आपकी गीता है| इसके अलावा कहीं और भटकने की आवश्यकता ही नहीं है| अल्लामा इक़बाल ने कहा भी था –

ढूँढ़ता फिरता हूँ मैं इक़बाल अपने आप को
आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूँ मैं|

जब हम राजनैतिक दलों की बात करते हैं तो मोटे तौर पर उन्हें समाज और राजनीति के दृष्टिकोण से समझा जा सकता है| ज़ाहिर है कि दोनों दोनों दृष्टिकोणों में बहुत अंतर होता है| एक सामाजिक सुधार, सामाजिक उत्थान, सामाजिक समानता और धर्मनिरपेक्षता आदि सिद्धांतों के आधार पर राजनैतिक दल की व्याख्या करता है तो दूसरा मुख्य रूप से राजनैतिक शक्तियों की प्राप्ति और उन्हें बनाए रखने की प्रक्रिया की सफलता और प्रभावकता के आधार पर उनका मूल्यांकन करता है| समाजशास्त्री राजनैतिक दल को सामाजिक समूह मानते हैं जबकि राजनीतिज्ञ राजनीतिक दलों को आधुनिक राज्य में सरकार बनाने की एक प्रमुख संस्था के रूप में देखते हैं। मेरा व्यक्तिगत विचार यह है कि राजनैतिक दलों की दीर्घजीविता के लिए विशुद्ध राजनैतिक और समष्टिगत सामाजिक सरोकारों का मेल अनिवार्य है| समाज के उत्थान के लिए ही राजनीति होती है; इस बात को प्रत्येक राजनैतिक दल के लिए गाँठ बाँध लेना चाहिए| और, सामाजिक सरोकार भी कैसा! वह ऐसा कि जिसके पीछे गहरी इच्छाशक्ति और उद्देशों के प्रति सच्चाई न केवल छिपी हो बल्कि दिखाई भी देती हो और समय समय पर जानते बूझते अभिव्यक्त भी की जाती हो|

किसी भी राजनैतिक दल के लिए एक स्पष्ट विचारधारा का होना बेहद ज़रूरी होता है| इसके बाद उस विचारधारा पर आधारित प्राशासनिक और सामाजिक कार्ययोजना का होना आवश्यक है| अगला चरण है कि राजनैतिक दलों के चारों वर्ग एक ही भाषा बोले जिससे उनकी समझ भी एक जैसी हो| अक्सर देखने में आता है कि राजनैतिक दलों के राष्ट्रीय नेतृत्व, प्रादेशिक नेतृत्व, नगरीय नेतृत्व और स्थानीय नेतृत्व की समझ विचारधारा और कार्ययोजना को लेकर अलग होती है| परिणाम यह होता है कि जनता सही की खोज के पचड़े में न पड़कर ऐसे दलों से किनारा कर लेती है तथा दूसरे विकल्पों की खोज में लग जाती है|

परिंदों की कतारें उड़ नहीं जाती तो क्या करतीं
हमारी बस्तियों में सूखी झीलों के सिवा क्या है|

विचारधारा के बाद सिद्धांत और मूल्यों पर आधारित राजनीति की बात आती है| समाज, देश और विश्व में नैतिकता के अवमूल्यन पर कितनी भी बहस कर लें, लेकिन सच्चाई यह है कि गौतम, गांधी के इस देश में मूल्यों की समझ और उनका सम्मान कभी समाप्त नहीं हो सकता| मूल्यहीनता को स्वयं मूल्यहीन होने का बहाना नहीं बनाया जा सकता|

२०वी शताब्दी के मध्य तक विशेष रूप से द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यह बात स्पष्ट हो गयी थी कि प्रजातंत्र ही सर्वश्रेष्ठ राजनैतिक व्यवस्था है| जनतंत्र या प्रजातंत्र के बारे में अलग अलग नज़रिए रहे हैं| नाजी या फासीवादी, जापान, इटली और जर्मनी, माओवादी, हो ची मिन्ह और कास्त्रो के समर्थक आदि साम्यवादी और समाजवादियों का दावा था कि वे सच्चे जनतांत्रिक है बस उनकी जनतंत्र की अवधारणा यूरोप में विकसित जनतांत्रिक अवधारणा से अलग है| ज़ाहिर सी बात है कि दुनिया के अधिकतर विचारकों ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया| हमारा जनतंत्र का माडल कम से कम दो राजनैतिक पार्टियों वाले अमेरिकी जनतंत्र की अवधारणा से लिया गया है| इस तरह के जनतंत्र की कसौटी सार्वजिक निष्पक्ष और निर्भय चुनावों के आधार पर चुनी हुई सरकार द्वारा देश के प्रशासन को चलाना और कुशलता से चलाना ही समझा गया है| इस पूरी प्रक्रिया में आलोचना और प्रत्यालोचना को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है|

मेरा मानना है कि भारत जैसे देश में राजनैतिक दलों को लम्बे समय तक जीवित रहना है तो जनतंत्र की शक्ति को समझना और मानना पड़ेगा| सच्चे अर्थों में उस पूरी प्रक्रिया पर अमल करना पड़ेगा जिसकी जड़ें जनतंत्र की अवधारणा से रस और पोषण पाती हों| दलों के विचारक बौद्धिक रूप से तो दल को संपन्न कर सकते हैं लेकिन उन विचारों के प्रकाशन और कार्यान्वयन के लिए जनाधार चाहिए| राजनैतिक दलों को अगर ज़मीन से जुड़े लोग चाहिए जिनके पास विशाल जनाधार हो तब उन्हें जनतांत्रिक अवधारणा को अपनी ढांचें में लागू करना पडेगा| सभी के लिए यह समझ लेना आवश्यक है कि राजशाही समाप्त हो चुकी है और जो थोड़ी बहुत राजशाही की मानसिकता बची भी है वह विनाश के कगार पर है|

पिछले कुछ दशकों से देश की राजनीति अजीबो गरीब दौर से गुजर रही है| आरक्षण, पंचायती राज, लोकपाल विधेयक, विदेशों में जमा काला धन जैसे मुद्दों पर राजनैतिक पार्टियों की जान मुसीबत में फंसी रहती है| सरकारों और पार्टियों का रुख इन मुद्दों पर अब तक ढीला ढाला ही रहा है| आज का भारतीय भ्रष्टाचार की समस्या से विशेष रूप से परेशान रहा है| वह चाहता है कि देश को इस समस्या से निजात दिलाया जाए|

इसके अतिरिक महिला सुरक्षा एवं सशक्तिकरण को लेकर बहुत सारी बाते कहीं जाती हैं कुछ थोड़ा बहुत काम भी होता है लेकिन इतनी बड़ी समस्या से जूझना है तो कुछ आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे जिन्हें लेकर राजनैतिक दल या तो गंभीर नहीं है या उनकी गंभीरता आम जनता तक पहुँच नहीं पाती|

गरीबी उन्मूलन देश की बड़ी समस्या है| परेशानी यह है कि हमारा देश नारों का देश बन गया है| कुछ मुद्दों की सार्थकता केवल नारों की रचना में ही रह गयी है|

कुछ बातों के मतलब हैं और कुछ मतलब की बाते हैं
जो यह फर्क समझा लेगा वो दीवाना तो होगा|

इसी तरह महंगाई को लेकर तरह तरह की बाते कहीं जाती हैं लेकिन इस समस्या के उन्मूलन के लिए ठोस उपाय कहाँ है| अगर हैं, तो उन्हें सार्वजिक करने से क्या परहेज है| अपनी बात कही तो जाए और पुरजोर तरीके से कही जाए –

जादू वो लफ्ज़ लफ्ज़ में करता चला गया
और हमने बात बात में हर बात मान ली|

देश की सुरक्षा, मर्यादा और सम्मान को लेकर राजनैतिक दलों के क्या विचार हैं, आम आदमी जान ही नहीं पाता| आप विश्वास करें की आज के दौर में भी जब भूमंडलीकरण और विश्वनागारिकता की अवधारणा अपने पूरे उठान पर है, ये मुद्दे आम भारतीय के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं| वैसे भी आम भारतीय इन मामलों को लेकर बहुत संवेदनशील होता है|

हाशिये पर खड़े अंतिम हिन्दुस्तानी के लिए राजनैतिक दलों के पास क्या ठोस कार्य योजनाएं है, आम आदमी को नहीं पता| उसके हिस्से में तो बस तकलीफें, संघर्ष और जीवन की मूलभूत सुविधाओं को जुटाने की जद्दो-जहद ही आती है|

दरिया चढ़ा तो पानी नशेबों में भर गया
अबके भी बारिशों में हमारा ही घर गया|

ये तो बस उदाहरण के रूप में केवल कुछ ही मुद्दे हैं| पतीली के चावल पके या नहीं यह देखने के लिए पूरे बर्तन को खंगालने की ज़रुरत नहीं होती, बस दो-चार चावल देख लेना ही काफी है| रोज़गार, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, चिकित्सा, सम्मान, बालश्रम, आरक्षण जैसे असंख्य मुद्दे हैं जिन्हें किसी न किसी भय के चलते या तो अनदेखा कर दिया गया या राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव में ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया| अक्सर राजनीतिज्ञों को यह कहते सुना जाता है कि जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है| वह मुद्दों को भुला देती है| आप मेरी बात का विश्वास मानिए उसकी याददाश्त कमजोर नहीं होती बल्कि अकसर वह राजनैतिक पार्टियों की मुद्दों को लेकर की जाने वाली हीला-हवाली की वजह से निराश होकर उन मुद्दों को अल्पकालिक रूप से अनिर्णीत मुद्दों के खाने में डाल देती है|

परेशानी यह है कि सरकारें और राजनैतिक दल सभी समस्याओं के फौरी उपाय सोचते हैं जिन्हें दूसरे शब्दों में ‘मेक शिफ्ट अरेंजमेंट’ कहा जाता है| इनके पीछे वर्गों और सम्प्रदायों को लुभाने की भावना अधिक रहती है| दूरदर्शिता का अभाव रहता है| राजनैतिक दल अक्सर यह भूल जाते हैं कि समस्याओं की गहनता की सच्चाई को सापेक्षता के सिद्धांत से ही समझा जा सकता है इसी तरह समस्याओं के समाधान को भी सापेक्षता के सिद्धांत की रोशनी में ही समझा जा सकता है|

आज के समय में देश में ५० प्रतिशत से अधिक संख्या २५ वर्ष से कम आयु के नौजवानों की है| आज का नौजवान वर्ग का हिस्सा बनाना पसंद नहीं करता| वह चाहता है कि उसे व्यक्ति के रूप में पहचाना जाए| आज का भारतीय युवा जाति-धर्म-सम्प्रदाय जैसे वर्च्युअल मुद्दों पर ध्यान नहीं देता| वह खुल कर अपने स्वयं के और अपने राष्ट्र के विकास के लिए ठोस कार्य-योजना की मांग करता है| अगर इस युवावर्ग का साथ पाना है तो राजनैतिक दलों को उसकी अपेक्षाओं पर खरा उतरना पडेगा| जो भी राजनैतिक दल ऐसा कर पाता है वह वह युवाओं का समर्थन पा लेता है|

युवाओं को राजनैतिक रूप से सक्रिय करने के एक अन्य आयाम जिसे मैं देखता हूँ वह है सांस्कृतिक आयाम| समाज के उम्रदराज़ लोग कईं बार युवाओं को अपनी संस्कृति से दूर जाता हुआ समझते हैं, पर सत्य यह है कि उनमें से बहुत से युवा अपनी जड़ों की खोज में प्राचीन दर्शन, साहित्य और संस्कृति का गहनता से अवगाहन कर रहे हैं| वे उसमें नए-नए प्रतीक खोज रहे हैं| नए-नए अर्थ की घड़ रहे हैं| भले ही पढाई या रोजगार के लिए उन्हें दूसरे देशों में रहना पड़ रहा हो पर फिर भी वे संस्कृति से अपना जुड़ाव अभिव्यक्त करते रहते हैं| सोशल मीडिया साइटों पर, ब्लॉगों में, देश विदेश से प्रकाशित होने वाली ऑनलाइन पत्रिकाओं में यह जुड़ाव अभिव्यक होता रहता है और वह भी बिना किसी दुराग्रह या पूर्वाग्रह के| आज का युवा बहुत हद तक अपने काम, सोच और समझ में प्रोफेशनल है|

आज का भारतीय युवा सूचना क्रान्ति का वाहक है| मेरी बात पर विश्वास कीजिए कि वह दिन दूर नहीं हैं जब दुनिया का सबसे अमीर और ताकतवर वह व्यक्ति, समाज या देश होगा जिसके पास सूचनाओं का सबसे बड़ा भण्डार होगा|

इस असीम ऊर्जा का लाभ लेना है तो राजनैतिक दलों को वैसा वातावरण तैयार करके युवाओं को देना पडेगा जिसमें वे विकसित हो सकें, पुष्पित हो सकें और फलित हो सकें|

उपसंहार; जनतंत्र में आस्था, लक्ष्य में स्पष्टता, समाज के प्रति कर्त्तव्यनिष्ठा, समस्याओं की समझ, दृष्टिकोण की उदारता, संसाधनों का सदुपयोग, जवाबदेही, दूरदृष्टि, अनुशासन, सबको साथ लेकर चलने की भावना और दृढ इच्छाशक्ति आदि कुछ ऐसी कसौटियाँ हैं जिनके आधार राजनैतिक दल अपनी उपयोगिता को माप सकते हैं|

और अंत में -

जो पर समेटे तो एक शाख भी न पाई
खुले थे पर तो मेरा आसमां था सारा|

 

2 comments: