अपनी बात

"ब्लॉग, जो विधाओं की सीमा से परे होकर अभिव्यक्ति की बात करता है, जो विचार की बात करता है चाहे वह कहानी, हास्य, व्यंग्य, कविता, समीक्षा, लेख, डायरी, भाषण, निबंध जैसे किसी भी रूप में हो; जहाँ भावना की प्रधानता भाषा से किसी भी रूप में न्यून नहीं है; जिसके विषय में घर, परिवार से लेकर फिल्म, नाटक, साहित्य, समाज, खेल, राजनीति, अर्थशास्त्र, कला आदि सभी आ जाते हैं|"

Monday, September 17, 2018

इस कहानी में बहरहाल कई बातें हैं

जहाँ तक मुझे याद आ रहा है यह 1998 की बात है। अक्टूबर के मिडटर्म की तैयारी हो रही थी। यूँ तो सब ठीक-ठाक था, पर न जाने क्यों फिर भी कुछ अजीब सा लग रहा था। उस साल वर्षा भी कुछ ज्यादा हुई थी। आदरणीय डॉक्टर मोहन चंद जोशी, आदरणीय बसंत लाल आहूजा और मैंने मिलकर एक टोली बनाई और यह तय किया कि इस बार मिडटर्म के दौरान डोडीताल की यात्रा की जाएगी।
मांझी रुकते हुए सभी लोग तीसरे दिन शाम को सकुशल डोडीताल पहुँच गए। ठंड बहुत थी। हल्की-हल्की बारिश भी शुरू हो गई थी। जोशी जी ने मुझे आदेश दिया कि जाओ, वासुदेव के साथ जंगल से कुछ लकड़ियाँ इकट्ठी कर लाओ। लड़कों के होंठ नीले पड़ रहे थे। कंपकंपी छूटी हुई थी। हाल तो अपना भी वही था। पूरे रास्ते आगे-पीछे भागते-भागते थकान भी हो गई थी। ऊपर से कड़ाके की भूख लगी थी। और भी कुछ न हो, तो कम से कम एक कप चाय पीने का बहुत मन था। ठीक है, परेशान था लेकिन जमाना बदलाव के उस मोड़ पर अभी पहुँचा नहीं था जहाँ अपने आदरणीय बड़ों को सीधे-सीधे मना किया जा सकता हो। अपनी तेजी और अपने बल का अहंकार तो था लेकिन उम्र-दराज लोगों के अनुभव की कद्र भी थी। लकड़ियाँ इकट्ठी करके आग जलाई गई। आग की तपिश मैं लड़कों के चेहरे, कान और नाक फिर से लाल हो गए। सब स्वस्थ दिखाई देने लगे थे।
जंगल-विभाग के अतिथि-गृह में रात बिताना निश्चित हुआ। साथ आये हुए रसोइयों ने दाल-चावल का भोजन तैयार किया। दून स्कूल के मिडटर्म की सफलता में सी. डी. एच. के पाचकों का भी बड़ा योगदान रहा है। मैंने अनेक बार उन्हें कठिनाई झेलते हुए भोजन की व्यवस्था करते हुए देखा है। हालात भले ही बद से बदतर होते रहे हों लेकिन उन्हें अपनी जिम्मेदारी से मुकरते हुए कभी नहीं देखा।
आवास-गृह में एक बड़ा सा कमरा हमें मिला जिसमें सब घुसकर सो गए। सभी थके हुए थे। थकान और नींद बिस्तर नहीं देखती। किसका पैर किस के मुँह पर पड़ा हुआ था और किसका हाथ किसके पेट पर, कुछ पता न था। जैसे कभी-कभी ऊन का गोला ढीला होकर उलझ जाता है और उसका कौन सा सिरा कहाँ से शुरू होता है और कहाँ खत्म होता है, पता नहीं चलता। बिल्कुल वैसे ही सभी थके हुए लोग उस कमरे में समाए हुए थे। एक दूसरे में उलझे हुए।
रात गहरा गई थी, बस इतना याद है। समय का अंदाजा नहीं। अचानक तेज बिजली कड़की। आसमान से रोशनी का ज्वालामुखी सा फूट पड़ा। एक के बाद एक रोशनी के विस्फोट होने लगे। तेज बारिश शुरू हो गई। सारी रात वर्षा होती रही, तेज वर्षा। इतनी भयानक वर्षा मैंने जीवन में कभी नहीं देखी। लगता था कि प्रलय अब आई और तब आई। गेस्ट हाउस के बाहर टीन की छत पर गिरती पानी की बूँदें युद्ध के मैदान में लगातार चलती गोलियों सरीखी आवाज़ कर रही थीं। पानी के शोर से सभी जाग गए थे। कुछ लेटे थे, कुछ बैठे थे पर सोया कोई न था। एक-दूसरे से सटे हुए, सहमे हुए, घबराए हुए और एक-दूसरे का सहारा बने हुए सभी चुपचाप बैठे थे। कोई बोल नहीं रहा था लेकिन सब अपनी बात कह रहे थे और सब दूसरों की बात सुन रहे थे।
चुप्पी अपने-आप में बहुत मुखर होती है। कई बार लोग इसलिए अधिक बोलते हैं कि वे दूसरों पर जताना चाहते हैं कि देखो मैं कितना बड़ा ज्ञानी हूँ। देखो, मैं कितना अधिक जानता हूँ। मैं तुमसे श्रेष्ठ हूँ और तुम ज्ञान के मार्ग पर चलने वाले मेरे अनुचर हो इसलिए चलो, मेरे ज्ञान की इज्जत करो। आओ, मेरी सम्मान पाने की प्यास को तृप्त करो। इस बोलने के पीछे ज्ञान बाँटने की भावना नहीं बल्की अपने अहंकार को सहलाने की कोशिश होती है।
मैंने धीरे से जोशी जी से कहा कि गुरुदेव, लक्षण अच्छे नहीं हैं। कुछ ना कुछ बड़ा घटने वाला है। बच्चे भी डरे हुए हैं।
उन्होंने उत्तर दिया कि शांत रहो। इन पलों को निकल जाने दो फिर सुबह को देखते हैं कि क्या करना है। इस समय तो सिर्फ इतना करो कि सब को कमरे के चारों कोनों में दुबक कर बैठ जाने के लिए कह दो। छत का भी कोई भरोसा नहीं है।
कई घंटे की अनवरत भारी वर्षा के बाद सुबह जल का वेग कुछ कम हुआ तो तुरंत नीचे उतरने का निर्णय लिया गया। सामान बाँध कर सभी आनन-फानन में नीचे की ओर भागे। दोपहर होते-होते संगमचट्टी पहुँचे तो पता चला कि वर्षा में पत्थर आने की वजह से संगमचट्टी का पुल बह गया था। जगह-जगह भूस्खलन होने की वजह से हमें उत्तरकाशी ले जाने वाली बस का भी संगमचट्टी पहुँचना असंभव था। एक लंबा रास्ता लेकर मार्ग बदलते हुए किसी तरह संगमचट्टी पहुँचे और फिर वहाँ से पैदल ही उत्तरकाशी के लिए निकल पड़े। उत्तरकाशी पहुँचते-पहुँचते रात हो गई थी।
जगह-जगह भूस्खलन होने की वजह से रास्ते बंद हो गए थे। टेलीफोन लाइन ध्वस्त हो गई थी। मोबाइल फोन थे नहीं। टेलीफोन विभाग की तत्परता के चलते अगले चौबीस घंटे में जब फोन चालू हुए तब स्कूल संपर्क किया। डॉक्टर ब्याला ने बताया कि कुछ छात्र गंगोत्री एरिया में फँसे हुए हैं जिन्हें निकालना बेहद ज़रूरी था। उन्होंने निर्देश दिया कि तुरंत गंगोत्री के लिए निकलो और उन सभी छात्रों को सुरक्षित रूप से एकत्रित करके अपने पास रखो।
आपातकाल में नेता से बिना बहस किए उसकी बात मान लेना अच्छा होता है। वर्षों के अनुभव से पैदा हुई अक्ल पर विश्वास करना अच्छा होता है। मैंने तुरंत उनकी बात मानी और वासुदेव (एक पुराना और विश्वस्त गाइड) के साथ निकल पड़ा। अगले अड़तालीस घंटे जहाँ-तहाँ बिखरे हुए छात्रों को एकत्रित करने में बीते। इन बेहद कठिन और खतरनाक अड़तालीस घंटों में हम दोनों ने कम से कम चौंतीस-पैंतीस घंटे पैदल सफर किया होगा।  इस दौरान मैंने समझा कि ‘दून स्कूल का  मास्टर’ होने का  अर्थ क्या होता है। मैंने जाना कि उत्तरदायित्व को लेना और उत्तरदायित्व को निभाना दून स्कूल के चरित्र का अभिन्न अंग है। मैंने समझा कि कठिनाइयों को झेलना और उनसे संघर्ष करते रहना दून स्कूल का स्वभाव है। मुझे लगता है कि मेरा ‘दून स्कूल का मास्टर’ बनने का सफर सही अर्थों में वहीं से शुरू हुआ था। इससे पहले तो मैं मात्र एक अध्यापक था लेकिन इस घटना ने मुझे ‘मास्टर’ के रूप में बदल डाला।
रास्ते पूरी तरह बंद थे। स्पष्ट था कि हमें कुछ दिन उत्तरकाशी में ही रहना था। जोशी जी ने कुड़ियाल परिवार के साथ संपर्क किया और उनसे धन के रूप में कुछ सहायता की मांग की जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया और हमारी आवश्यकता का धन हमें मुहैया करा दिया। उस वर्ष हमारी दीपावली भी उत्तरकाशी में ही मनी। सभी छात्रों के लिए आलू और पूरी का भोजन बना और सभी छात्रों को दीपावली मनाने के लिए दो-दो फुलझडियाँ भी दी गई। समय कठिन था लेकिन कठिनाई का अर्थ यह नहीं होता कि हम आनंद मनाने की कला को भूल जाएँ।
उधर, बच्चों में भी हलचल कम नहीं थी। चिंता, असुरक्षा और अस्थिरता का माहौल बना तो था, किंतु अध्यापकों की उपस्थिति ने उस भावना को बहुत जल्दी तिरोहित कर दिया। दिन में दो बार सुबह और शाम के समय हम सब लोग एक साथ बैठते और स्थिति की जानकारी एक दूसरे को देते। हम मास्टरों की तरफ से कोशिश यह रहती कि छात्र तनाव में ना आएँ। मैं देखता था कि छात्रों की तरफ से भी यह पूरा प्रयास रहता था कि मास्टर तनाव में ना आएँ। अपने छोटे-मोटे झगड़े, छोटी मोटी समस्याएँ वे आपस में ही निपटा लेते थे। एक दिन स्थिति यह थी कि हमारे पास पर्याप्त भोजन नहीं था। मुझे हार्दिक प्रसन्नता हुई जब मैंने देखा कि बिना किसी के कहे ही बड़े लड़कों ने छोटे लड़कों को अपने हिस्से का भोजन दे दिया। हम में से काफी लोग उस दिन भूखे रहे, किंतु मन तृप्त था। छात्रों के चरित्र को परत-दर-परत समझने का वह अनोखा अवसर था। सह-अस्तित्व का भेद मुझे उसी दिन मालूम हुआ।
जोशी जी और आहूजा साहब का अधिकतर समय लड़कों की बात उनके माता-पिता से कराते, स्थानीय प्रशासन से नवीनतम सूचनाएँ जुटाते, अभिभावकों को धीरज बँधाते ही बीतता था। समय-समय पर वे स्कूल में हैडमास्टर मेसन साहब से बात करते और उन्हें बताते कि परेशान होने की कोई दरकार नहीं है। मेरा काम दौड़-भाग का था। जहाँ कहीं से हमारे छात्रों के बारे में कोई सूचना मिलती, मैं एक-दो गाइडों के साथ थोड़ा खाना-पानी और जरूरी दवाइयाँ लेकर निकल पड़ता। कक्षा के बाहर हमारे छात्र जीवन को पढ़ते हैं, जीवन को समझते हैं, जीवन जीने की कला को सीखते हैं और जीवन के मर्म को पहचानते हैं। दस दिनों में आदरणीय जोशी जी और आहूजा साहब के  संयत व्यवहार को देखकर मैंने तो यही सीखा कि जवानी की ऊर्जा का अपना महत्त्व होता है लेकिन वह कभी भी सफेद दाढ़ी के प्रभाव को धूमिल कर उसका स्थान नहीं ले सकती।
बीस गुणा तीस की क्लास में बैठ कर हम उतना नहीं सीखते, जितना जिंदगी के मदरसे में सीखते हैं। कक्षा में बैठते हैं, किताबों को पढ़ते हैं, अध्यापकों को सुनते हैं, साथियों से बात करते है, इंटरनेट खंगालते हैं और थोड़ी सी जानकारी इकट्ठा कर लेते हैं। कभी-कभी लाइफ-स्किल की  कक्षाओं में भी बैठते हैं और जीवन के सार को समझने का गुर सीखने की कोशिश करते हैं। सच तो यह है कि कुशलताएँ और जानकारियाँ जब तक हम जीवन पर घटाना नहीं सीखते तब तक  बुद्धिमान नहीं बनते। सूचनाओं के  ये टुकड़े उस ज्ञान का प्रारम्भिक सोपान मात्र होते हैं, जिसे हम अक्ल, बुद्धि या ‘विस्डम’ कहते हैं। जानकारी पाने में देर नहीं लगती। जानकारी को खट से पाया और झट से सहेजा जा सकता है लेकिन अक्ल धीरे-धीरे आती है, समय के साथ आती है। चंद सालों में इकट्ठा की गई सूचनाओं को प्रसंस्कृत करके उसके मूलभूत तत्व को पाने में पूरा जीवन लग जाता है।
अंत में दसवें दिन थोड़ी देर के लिए रास्ता खुला और हम लोग देहरादून के लिए निकल पड़े। लेकिन अभी और भी परीक्षाएँ बाकी थीं। धरासू बैंड के पास बस ड्राइवर ने जोरदार ब्रेक लगाए और झटके से सभी की नजर सामने सड़क पर पड़ी। पहाड़ का एक बड़ा सा हिस्सा भयानक आवाज करते हुए नीचे गिर रहा था। रास्ता फिर बंद हो गया था। सभी की खुशी पर पानी फिर गया। बस ट्रैफिक में फंस गई थी जिसकी वजह से वापस उत्तरकाशी जाना भी संभव न था। कई घंटे सड़क पर ही बिताने के बाद मैंने जोशीजी और आहूजा साहब को राय दी कि भूस्खलन को पैदल पार करके दूसरी और चलते हैं। इसके बाद देखेंगे कि क्या करना है। दोनों मेरी बात से सहमत हुए। हमने घुटनों-घुटनों कीचड़ में चलते हुए सावधानी के साथ एक-एक लड़के को भूस्खलन का क्षेत्र पार कराया। सभी लोगों के दूसरी और आते-आते रात हो गयी थी।
अगली चुनौती सात किलोमीटर दूर चिन्यालीसौड़ तक पहुँचना था। मैं और आरूश सुगानी (जहाँ तक मुझे याद है) रात के अँधेरे में दौड़ते हुए चिन्यालीसौड़ तक पहुँचे। वहाँ एक होटल वाले को सोते से उठाया और उसके पास उपलब्ध चार कमरों को अपने लिए आरक्षित किया। संयोग की बात है कि डॉक्टर ब्याला भी तीन जीपों के साथ भूस्खलन वाली जगह पर पहुँच गए। सारा दल उनके साथ रात ग्यारह बजे के करीब होटल पहुँच गया।
अगली सुबह मुँह अँधेरे ही हम देहरादून के लिए रवाना हो गए। हमारा सामान लेकर हमारी बस चार दिन के बाद देहरादून लौटी।
इन ग्यारह दिनों में स्कूल में क्या-क्या हुआ, इस बारे में बात-चीत फिर कभी। फिलहाल तो ज़फर के शब्दों में -
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो थी
जैसी अब है तिरी महफ़िल कभी ऐसी तो थी


चित्र https://rishikeshriverrafting.co.in/ एवं /www.holidaymine.com/ से साभार 

Tuesday, February 27, 2018

मिलन


















दोनों हैं यदि  एक  बता फिर अपना मिलन कहाँ होगा!

मैं  पथरीले  पथ का  राही तू खिला फूल है उपवन में,
मैं  मरुस्थल  प्यासा  हूँ  तेरे सरस स्रोत बहा मन में,
मैं आँसू  टपका  आँखों  से  और रुपहला मोती है तू,
मैं  दीपक की जलती बाती और दमकती ज्योति है तू|

जिसमें जीवन हो साथ मृत्यु के, ऐसा जनम कहाँ होगा!
दोनों हैं यदि  एक  बता फिर अपना मिलन कहाँ होगा!

तू बसंत की सुबह सुनहरी  मैं तम हूँ घिरती रातों का,
तू  नई नई  पहचान विषय हूँ मैं तो बिसरी बातों का,
तू भीतर - बाहर  मदिरा है मैं तीव्र गरल पूरितप्याला
तू  सुख  की  मीठी निद्रा है मैं रात रात जगने वाला|

धरती सूरज से मिले वस्तुतः, ऐसा क्षितिज कहाँ होगा!
दोनों हैं  यदि एक बता फिर अपना मिलन कहाँ होगा!

मैं  चीत्कार  एकाकी  मन  का तूने बस सीखा हँसना,
मैं  काँटों  का सौदागर तू पलक सेज पर सोता सपना,
मैं  काला  तप  हुआ धूप में तू गोरी छाया में पलकर,
मैं हूँ बंधा सरोवर और  तू बहती नदिया कल-कल कर|

फूल रहे  घर  अंगारों के   ऐसा  चलन  कहाँ  होगा!
दोनों  है यदि एक बता फिर अपना मिलन कहाँ होगा!

Monday, February 5, 2018

नायक - नायिका प्रकरण: उमाकान्त शुक्ल के दोहे (भाग ५)



































कवि – श्री उमाकांत शुक्ल

पत्रव्यवहार - ६०४ संजय मार्गनई मंडीपटेल नगरमुजफ्फर नगरउत्तरप्रदेश|


फेसबुक यू आर एल - https://www.facebook.com/umakant.shukla.58


 मेल  shukla_umakant@rediffmail.com


दूरभाष 
+९१९९९७८३७०६२

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नायक - नायिका प्रकरण

नारी
जिसके होने से लगे यह संसार ससार|
उस मृगनयनी - वृंद का स्नेह न कभी बिसार||८२३||

नारी सुधा सुगंध अरु मदिरा का भृंगार|
मानवता का हो सका उससे ही श्रृंगार||८२४||

जिस घर में न विराजती नारी शक्ति अपार|
लक्ष्मी वहाँ कहाँ रहे कहाँ शील आचार||८२५||

तटी रूप-रस-सरित की घटी सुधा की जान|
स्त्री कमनीयाचार की मंजुलतम पहिचान||८२६||

अधरों में अमरित भरा नयनों में अनुराग|
नारी के कुच - कलस में स्थित तुहिनाचल आग||८२७||

जिसके एक कटाक्ष से ब्रह्मा विष्णु महेश|
अकुलाते नारी कहाँ अबला कहिए शेष!||८२८||

नित अनुशासन में ढला महिला - रत्न ललाम|
जिसका नर होता चला आया सदा गुलाम||८२९||

नारी-चितवन को दिया विधि ने वो वरदान|
जिससे आकर्षित हुआ रहता अखिल जहान||८३०||

नारी दृष्टि-विलास में व्यापा परमानंद|
उसके बिना न जगत में मिलता विषयानंद||८३१||

नर नारी से पूर्ण है नारी नर - अनुरूप|
यही भौम शिव-शक्ति का मंजुल मंगल रूप||८३२||

उमा बिना शंकर कहाँ रमा बिना हरि कुत्र|
नारी बिना अपूर्ण है नर इह लोक अमुत्र||८३३||

नारी कल्याणी विभा सुदंरता की खान|
इसके गुण-गण का करें कहाँ कवीश बखान||८३४||

है हिमांशु ठंडा निरा है रवि केवल उष्ण|
नारी-तेज विराजता भू पर समशीतोष्ण||८३५||


नायिका – नख - शिख वर्णन

लावण्य
कहीं पीनता गात में कहीं क्षीणता रोप|
वयःसंधि ने रूप में रची लुनाई ओप||८३६||

रूप
अल्हड़ यौवन ने भरी ज्यों ही एक उछाल|
रूप-राशि में युवति की आने लगा उबाल||८३७||

केश
काले घुँघराले घने चमक - दमकते बाल|
विद्युल्लता-विलास भर बादल उठे अकाल||८३८||

माथा
बिंदिया माथे पर लगी जुबती - रूप निहाल|
मीनकेतु का मनु हुआ विजयोत्सव तत्काल||८३९||

भौहें
भौहें गोरी की लसें बाँकी काम-कमान|
लक्ष्य साध चलने लगे लो नैनों के बान||८४०||

नयन
नयनों की रसनीयता देख विमूढ सरोज|
उत्कंठित हो देखना चाहें स्वयम उरोज||८४१||

थी बेबसी छलक गया आँसू एक अमोल|
पारद मोती बन लसा मोती पारद लोल||८४२||

नासिका
तिल - प्रसून सी नासिका इक सौंदर्य-निकाय|
सुंदरता की परख का मानो एक उपाय||८४३||

अधर
अधर - कांति ले हो गया नासा - मौक्तिक रक्त|
एक भाव से दूसरा भी होता अनुरक्त||८४४||

कान
कानों से बुंदे सजे या बुंदों से कान|
आज तलक कवि - गण कहाँ कर पाया संधान||८४५||

कपोल
ललित कपोल गुलाब या चाँद अँगारा चंड|
उस पर लट का लोटना देख मनोज प्रचंड||८४६||

अधर
अरुण अधर पर छिटकती लासानी मुसकान|
देख दीन मदिरा मुधा सुधा उभय हलकान||८४७||

दंत
स्फटिक - धवल दंतावली दे मोती को मात|
कुंद - कली इठला सके उसकी क्या औकात||८४८||

चिबुक
चम्मच - भर शशिकला में ढली चिबुक माकूल|
सुंदरता का कंद वो या शोखी का मूल||८४९||

मुख
मुख पूनो का चंद्रमा देता मन को चैन|
नयन - चकोर जिसे निरखने को हैं बचैन||८५०||

मुसकान
होंठों पर उसके न गर होती मधु मुसकान|
फूल न खिलते दूर तक त्रिभुवन था वीरान||८५१||

कंठ
कंठ देख उलटा गिरा शंख सुराही भीत|
जहाँ तीन रेखा ललित मंगल शकुन पुनीत||८५२||

वाणी
वाणी में मिसरी घुली बातें हैं नमकीन|
पिक मराल हारे कहीं जा बैठे गमगीन||८५३||

बाहु
बाहों में उसकी भरा ललित लता का लोच|
आलिंगन उसको मिले जिसका भाग्य न पोच||८५४||

हाथ
कर-पल्लव में कमल की जागरूक सी भ्रांति|
दीपक की लौ सी ललित अंगुलियों की कांति||८५५||

चूडी
सुघड़ कलाई में पड़ीं खनक चूड़ियाँ लोल|
ललना के लावण्य पर बतियातीं जी खोल||८५६||

हस्तरेखा
श्यामा के कर-कंज की कहती भाग्य-लकीर|
होंगे इसके सामने सारे हाथ फकीर||८५७||

अंगूठी
हैं निसर्ग से अँगुलियाँ यद्यपि ललित अगूढ|
मुदरी पहन बना रहीं सारे जग को मूढ||८५८||

स्तन
हैं उरोज मंगल कलस कामदेव के भव्य|
निखिल - विश्व-कमनीयता के मानक मंतव्य||८५९||

अंगिया
कान्ता-कुच- औद्धत्य से ताना बाना ध्वस्त|
अँगिया का पूरी तरह सहृदय - मानस मस्त||८६०||

हार
मुक्ताहार विराजता हरिणाक्षी के वक्ष|
भोगी किंकर हो चले योगी सत्ता - दक्ष||८६१||

कमर
मदिराक्षी का था युँही दुबला कटि-प्रदेश|
पयोधरों के भार से अब लगता सविशेष||८६२||

नाभि
मुखमंडल - सौंदर्य की देख अनुत्तम सृष्टि|
स्तन-परिसर से फिसल कर गिरी नाभि में दृष्टि||८६३||

त्रिवली
अरी दृष्टि! थोड़ा सम्हल नही त्वरा का काम|
मुग्धा की है त्रिवलि ये चल अविकल गति थाम||८६४||

रोमावली
ताम्र - पत्र पर लिख दिया हो अनंग ने लेख|
त्यों तरुणी का राजता रोमावलि - अवरेख||८६५||

पृष्ठ भाग
केशपाश पीछे पड़ा इतराता अतिमात्र|
सावन - भादों की घटा झुकी तडित के गात्र||८६६||

नितंब
उसके ललित नितंब पर चढा रूप-संभार|
छोटी पड़ती मेखला लख हैरान सुनार||८६७||

मेखला
बाँधे गर विद्युल्लता गझिन सगर्व पयोद|
तब पाए जाकर कहीं कांची – सेवा - मोद||८६८||

जघन
शाला भाव - विलास की जघनस्थली ललाम|
भस्म हुआ पाता यहाँ आकर जीवन काम||८६९||

ऊरू
ऊरू - युगल मनोज्ञ जो ले मृदंग की बान|
गज - कर कदली - स्तंभ का क्षीण करें अभिमान||८७०||

पिंडली
पिंडलियाँ ज्यों काम के सजे - धजे तूणीर|
साथ - साथ ही बाँटती लगती सुख – दुख - भीर||८७१||

चरण
जो सौंदर्य - निवेश की देते मंजुल सीख|
उन चरणों से माँगते कमल कांति की भीख||८७२||

टखना उंगली नख
गुल्फ अंगुली और नख सब सौंदर्य-निधान|
अपने अतुल प्रभाव का लिखते आप विधान||८७३||

चाल
मृगनयनी की देख कर सधी छबीली चाल|
भूल गये अपनी सभी चाल गयंद मराल||८७४||

अंगड़ाई
अँगड़ाई उसकी सुधा मदिरा झंझावात|
उड़े बिखर उपमान सब हार शक्ति - संघात||८७५||

सोना-जागना
जगना पौ फटना तिरा सोना चंद्रोल्लास|
इतर क्रिया रस छंद की युक्ति अलंकृति - लास||८७६||

नायक-नायिका : परस्पर दर्शन 
मुखपुस्तक* में देखते इक दूजे को रोज़|
बिना स्पर्श - सुख के कहाँ दिल रौनक अफरोज़||८७७||*फेसबुक

नायक-दर्शन
आया मुसकाया कहे मधुर बचन सुख-सान|
आँख आँख ललना प्रथम पुनः कान ही कान||८७८||

नायिका-दर्शन 
कुछ बेहोशी कुछ खुशी था कुछ नशा अमंद|
प्रिया - दरस था विष - अमृत-मदिरा का आस्पंद||८७९||

विरह
शय्या करुणा की विपुल व्यथा – मंजु - संताप|
विरह - महोत्सव पीर का प्रेम – उक्ति - परिताप||८८०||

वियोगी की अवस्था 
खान पान परिधान की हैं रुचियाँ सब कोठ|
प्रिया – विरह – परिताप - बस प्रिय के बिबरन ओंठ||८८१||

वियोगिनी की अवस्था 
निष्प्रभ आनन - शशि हुआ कुच - मंडल अति छीन|
विरहानल से प्रिया की काया हुई मलीन||८८२||

वियोगी का विप्रलाप
अँकुडी डाल कटाछ की जिया ले गयी छीन|
मृगनयनी दुशवारियाँ देकर लाख हसीन||८८३||

काम के प्रति
क्या मनोज! हर-कोप की ठंडी हुई न आग|
जो पावक बरसा रहा विरही पर तज राग||८८४||

चंद्र के प्रति
चंद्र! किरन - पिचकारियों से बरसा विष-धार|
विरही जन पर तू न कर विषम मृत्यु का वार||८८५||

पवन के प्रति
मलयानिल! लेकर चला आ प्यारी की बास|
जिसका पा संपर्क मैं काटूँ विरह - प्रवास||८८६||

मेघ के प्रति
मेघ! प्रिया के देस से कुछ तो ला संदेस|
अवलंबन संतप्त का तू करना न भदेस||८८७||

मधुकर आदि के प्रति
उसकी छवि ले घूमते मधुकर! हंस! चकोर!|
क्या तुमने देखी प्रिया मेरी सारँग! मोर!||८८८||

कदंब आदि के प्रति
रोमांचित है नीप! तू तू अशोक! अनुरक्त|
तुम दोनों की भावना से मैं हूँ संसक्त||८८९||

वियोगिनी के प्रलाप (सखीसे)
मैं हूँ सरिता प्यार की काम - वीचि आपूर्ण|
प्रियतम हैं परदेस में मैं अपूर्णता पूर्ण||८९०||

प्रियतम की सन्निधि नहीं निशा उगलती आग|
चाँद कटोरा जहर का पोच हमारा भाग||८९१||

हृदय धधकता प्रेम का अंगारा दिन-रैन|
बहता मलयानिल सखी! दुगुन बढाता मैन||८९२||

मनोराग का तीव्र विष है भीतर लबरेज|
अम्माँ बापू या सखी किससे करूँ गुरेज||८९३||

वे दिन वे रातें वृथा जहाँ न प्रिय का संग|
भरी भीड़ में मैं हुई एकाकिनी असंग||८९४||

मेरे उनके बीच गिरि नदी नगर वन खेट|
देख अकेली पंचशर बना रहा आखेट||८९५||

मेरा दिल्ली जौब अरु उनका है टैक्सास|
स्थानांतरण न हो रहा उसकी धुँधली आस||८९६||

छुट्टी लेती हूँ अगर वेतन लेते काट|
कड़की में हो जायगी खड़ी प्यार की खाट||८९७||

बीतीं हैं मधु यामिनी कैसी कितनी बार|
सेवा-शर्तों से अभी पाया नही उबार||८९८||

विरह सताता रात में दिन में भारी काम|
सोम-लगे शनिवार तक कहाँ क्षणिक विश्राम||८९९||

मोबाइल पर हो रहीं हैं रोजाना बात|
अभिमुखता के जोड़ में उसकी कुछ न बिसात||९००||

ख्वाबों में दीदार हो यदि आ जाती नींद|
चक्कर में पैकेज के मिट्टी हुई पलीद||९०१||

गोली लूँ गर नींद की होता कार्य - विघात|
विरहानल से जल रहा एसी में भी गात||९०२||

बढा प्रदूषण जगत में दिखता है दिन-रात|
धर्म आदि पुरुषार्थ में भी इसका प्रतिघात||९०३||

नई सोच के जगत में हम रहते हैं किंतु|
काम – आर्त - जन में कहाँ रहता किंतु-परंतु||९०४||

सखी नायिका से
नयन-सीप से ढुलक कर फँस कंटकित कपोल|
तेरी गाथा कह रहा आकुल मोती लोल||९०५||

नायिका सखी से
आँखों के रस्ते घुसा दिलमें रहता मीत|
निरुपम ज्यों श्रुति - मार्ग से भावाकुल मधु गीत||९०६||

दूती – संप्रेषण
आखर आँसू प्रेम की मसी मनोज सहेज|
लेख काँपते हाथ दे रही सखी को भेज||९०७||

दूती नायक से
तुम सा सुभग! जहान में होगा दूजा कौन|
विश्वसुंदरी की टँकी जिस पर स्वीकृति मौन||९०८||

वो नवनीत - सुकोमला विरह - अग्नि का ताप|
सह न सकी आँसू हुई चल सम्हालिए आप||९०९||

नायिका नायक से
महानदी का दौड़ना नित्य सिंधु की ओर|
मेरी भावुक वृत्ति का तू ही अंतिम छोर||९१०||

नायक नायिका से
प्रथम दृष्टि में हर लिया तूने जिसका चैन|
उसे भूनता सेंकता नित्य जलाता मैन||९११||

तेरे नयनों की जहाँ शफरी हैं उद्वृत्त|
उसी रूप - सरि डूबता उतराता नित चित्त||९१२||

नायिका का प्रश्न (दूती से)
कैसा है क्या कर रहा था वह क्या की बात|
मेरे बारे में कहा क्या पूछी कुसलात||९१४||

नायिका का उपहास (दूती से)
तेरे प्रति क्या दृष्टि थी स्नेह उपेक्षा भाव|
तनिक बता उसका मधुर है या कटुक सुभाव||९१५||

नायक – दशा - वर्णन (दूती द्वारा)
तेरा नाम जबान पर चित्तभित्ति पर चित्र|
आँखों में अनुराग के उसके भाव विचित्र||९१६||

मुखपुस्तक* में देखता तेरी ही तसवीर|
पा लेने में ही तुझे उसकी सब तदबीर||९१७||*फेसबुक

सूर्यास्त - वर्णन 
अस्ताचल पर रवि गया रात्रि - काल आसन्न|
कोश - अंक में भर भ्रमर है कमलिनी प्रसन्न||९१८||

चकवी की अवस्था
रवि को लख कोपाकुला प्रिय को निरख सशोक|
भाव - संधि का चक्कवी रचती नाट्यालोक||९१९||

संध्या-वर्णन 
अंधकार के पर्स में रख प्रकाश का दाम|
संध्या तारक - मालिका आती चली ललाम||९२०||

रात्रि-काल 
चंद्र – चँगेरी - भर सजे नभ में नखत-प्रसून|
लिखा यामिनी-कामिनी का स्वागत मजमून||९२१||

अंधकार
छाया नीलांजन - तमस घटी लोक की त्यौर|
सोई बूढी रौशनी तान स्याहरँग सौर||९२२||

कृष्णाभिसारिका 
चली जा रही कामिनी! तुम जिस जन के पास|
उसका भाग्य सराह कर कुछ हो चले उदास||९२३||

दुग्धधवल मुखचंद्र से पहचानेंगे लोग|
चलिए बुरका ओढ कर कटे र॔ग का रोग||९२४||

ओढो काली ओढनी काला सब परिधान|
काले में छिप जायगा गोरा रूप - निधान||९२५||

मोर पेंच का पहनिए कर्णाभरण सम्हाल|
मरकत मणि का हार हो नीलकमल की माल||९२६||

गौर अंग पर छिड़किए कस्तूरी का चूर्ण|
कृष्ण पक्ष अभिसार की सभी योग्यता पूर्ण||९२७||

नायिका का प्रश्न (दूती से)
कैसा है क्या कर रहा था वह क्या की बात|
मेरे बारे में कहा क्या पूछी कुसलात||९२८||

नायिका का उपहास (दूती से)
तेरे प्रति क्या दृष्टि थी स्नेह उपेक्षा भाव|
तनिक बता उसका मधुर है या कटुक सुभाव||९२९||

नायक – दशा - वर्णन (दूती द्वारा)
तेरा नाम जबान पर चित्तभित्ति पर चित्र|
आँखों में अनुराग के उसके भाव विचित्र||९३०||

मुखपुस्तक में देखता तेरी ही तसवीर|
पा लेने में ही तुझे उसकी सब तदबीर||९३१||

सूर्यास्त-वर्णन 
अस्ताचल पर रवि गया रात्रि - काल आसन्न|
कोश - अंक में भर भ्रमर है कमलिनी प्रसन्न||९३२||

चकवी की अवस्था
रवि को लख कोपाकुला प्रिय को निरख सशोक|
भाव - संधि का चक्कवी रचती नाट्यालोक||९३३||

संध्या - वर्णन 
अंधकार के पर्स में रख प्रकाश का दाम|
संध्या तारक - मालिका आती चली ललाम||९३४||

रात्रि - काल 
चंद्र – चँगेरी - भर सजे नभ में नखत - प्रसून|
लिखा यामिनी - कामिनी का स्वागत मजमून||९३५||

अंधकार
छाया नीलांजन - तमस घटी लोक की त्यौर|
सोई बूढी रौशनी तान स्याहरँग सौर||९३६||

कृष्णाभिसारिका 
चली जा रही कामिनी! तुम जिस जन के पास|
उसका भाग्य सराह कर कुछ हो चले उदास||९३७||

दुग्धधवल मुखचंद्र से पहचानेंगे लोग|
चलिए बुरका ओढ कर कटे र॔ग का रोग||९३८||

ओढो काली ओढनी काला सब परिधान|
काले में छिप जायगा गोरा रूप-निधान||९३९||

मोर पेंच का पहनिए कर्णाभरण सम्हाल|
मरकत मणि का हार हो नीलकमल की माल||९४०||

गौर अंग पर छिड़किए कस्तूरी का चूर्ण|
कृष्ण पक्ष अभिसार की सभी योग्यता पूर्ण||९४१||

नक्षत्रोदय
नभ - मंडल में ये नही लाख नखत नायाब|
जड़ा निशा की ओढनी में सलमा पुरताब||९४२||

चंद्रोदय / ज्योत्स्ना
यह न पूर्ण शशि, है सुखद कनक कलस कमनीय|
यह न चाँदनी, है सुधा मदिरा आचमनीय||९४३||

पत्ते पत्ते पर खिली जहाँ चांदनी रात|
वहीं अंधेरों में छिपी पीड़ा की सौगात||९४४||

आकाराकारित हुई चित्त वृत्ति मानिंद|
विविधाकारो में ढली शशि चंद्रिका अनिंद||९४५||

फूलों में फूली चुभी शूलो में बन शूल|
कलियो में चटकी हुई चंद्रकला माकूल||९४६||

खुशियो की बगिया कहीं कहीं पीर की शान|
आग बर्फ है चंद्रिका आँसू है मुसकान||९४७||

नदियो में दौड़ी फिरे लहरों में बन हंस|
केशो में मोती बनी कानों में अवतंस||९४८||

नायक आगमन : औत्सुक्य
आँज महावर आँख में काजल बिन्दु कपोल|
दौड़ी भर हिय आतुरी प्रिया सुहाग अतोल||९४९||

हलो हो कहाँ आइए क्या रक्खूं पोशाक|
बाहर चल लेंगे डिनर कहां बने घर पाक||९५०||

स्मार्टफोन से कार्यक्रम प्रिया पूर्व निर्धार|
ब्यूटी पार्लर जा संवर करती साज संवार||९५१||

नायक आगमन : तैयारी 
प्रिय आना ही चाहते अब सखि! हो तैयार|
कक्ष सजा अपना छिड़क खुशबू रूप निखार||९५२||

चुहिया एसी आन कर थोडा करलूं ऐश|
काफी राम बनाएगा साहब होंगे फ्रैश||९५३||

नायक आगमन : स्वागत 
पलक बिछा मनुहार कर मुसकाई ज्यों फूल|
नैन भरे स्वागत किया प्रिय का सब अनुकूल||९५४||

अरे! आइए सैल्फी लेते हैं दो एक|
उधर देखिए हो गया हुआ नही रीटेक||९५५||

नायक का नायिका से प्रश्न 
दुबली लगती हुआ क्या तबियत तो है ठीक|
प्रियतम ने आ प्रिया से पूछा प्रश्न सटीक||९५६||

लगती हो कृश, जी, कहो क्यों, ये मम्मी डैड|
क्या, पूरी सेवा चहें नही छोडते बैड||९५७||

प्रणय- कलह

नायिका की मानमनौती
पाँचो विशिख अनंग ने साधे सुंदरि! तान|
आलिंगन की शरण दे बन तू ही तनत्रान||९५८||

नायिका से सखी का अनुनय 
टूटे मुक्ताहार - सा सखि! बिखरा प्रेयान|
मान छोड, करता तुझी पर अनंग अभियान||९५९||

कलहान्तरिता का प्रलाप 
प्रिय ने कितनी मिन्नतें की न दिया तब ध्यान|
अब मन्मथ पीछे पड़ा लेगा मेरी जान||९६०||

नायक की मानमनौती 
समझ मुझे एकाकिनी तंग कर रहा काम|
प्रियतम! प्राणों पर बना संकट लीजै थाम||९६१||

नायिका की चेतावनी 
उस चुड़ैल से बच समझ वो है नकली नोट|
असली से मुह मोड कर खाएगा तू चोट||९६२||

नायक की सफाई 
सारा मोहल्ला पडा पीछे सुंदरि! जान|
उलटा - सीधा कर रहा मेरा चरित बखान||९६३||

मैं तेरा काजल अधर - राग हार अरु बिंदु|
आसमान को छोड़कर कहाँ रहेगा इंदु||९६४||

प्रिय की चाटूक्तियाँ 
काले घुँघराले गझिन खुल लहराते बाल|
देख घटाएँ घुमडती पानी भरें बिहाल||९६५||

बाले! तेरा देख मुख शशि को चढे बुखार|
घटत बढत के फेर में पड़े कांति - संभार||९६६||

कुच - द्वन्द्व उपमेय के सब उपमान अपंग|
रुचे कहाँ कवि वृंद को श्रीफल आदि बिरंग||९६७||

गहन नाभि यूँ सोहती ज्यों अनंग तूणीर|
चुन चुन कर जिसमें रखे उसने पांचों तीर||९६८||

सांगोपांग मनोज्ञता का अनुपम अनुपात|
आँक सुचेता मुग्ध हो क्यों न करे प्रणिपात||९६९||

अंग अंग लावण्य में ढला माधुरी पूर्ण|
कौन देख पाया तुझे सुमुखि! सकल - संपूर्ण||९७०||

कौन तुम्हारे स्पर्श का यहाँ नहीं मोहताज|
औंधे मुह गिरते दिखे बड़े बड़े सरताज||९७१||

पाँचों विषयों का चहै हर इंद्रिय आस्वाद|
भूखे प्यासे क्षुब्ध से पाँचों विकल विषाद||९७२||

नायिका का नायक को उपालंभ 
कितव कहाँ है आप - सा जग में दूजा नाथ|
भावों की प्रतिलिपि यहाँ मूल किसी के हाथ||९७३||

खो आए हो मन कहाँ सूनी सूनी बात|
हक्का बक्का क्यों हुए अब कैसा प्रणिपात||९७४||

क्षत - अंगारा ओंठ पर दहक रहा सरकार|
छाप हार की कंठ में कुछ करिए उपचार||९७५||

झाड़पोंछ कर धर लिया यों तो निर्मल वेश|
परिमल पर - सहवास का कहता कुछ सविशेष||९७६||

सब संबोधन हो रहे जहर बुझे ज्यो तीर|
अजी! छोडिए ये विनय करिये अब न अधीर||९७७||

ओठों पर काजल खिला करते बहकी बात|
बहके बहकै हैं कदम चढी कालिका मात||९७८||

माथ लिखी पर - अधर की छाप तीसरी आंख|
शिवजी! भस्म किया कहाँ काम जम गए पांख||९७९||